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जाने श्राद्ध के नियम: भूलकर भी नही करने चाहिए ये काम

pitrapaksha

पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध पितृदोष से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है। श्राद्ध श्रद्धापूर्वक किया जाता है तभी यह सम्पूर्ण माना जाता है और श्राद्ध कर्म और दान तर्पण से ही पितृों को तृप्ति मिलती है। श्राद्द करने के अपने कुछ नियम होते हैं। परिवार के जिस भी सदस्य की मृत्यु जिस तिथि को होती है उसी तिथि में उनका श्राद्ध किया जाता है। पूर्णिमा से अमावस्या तक 15 दिन श्राद्ध के होते है और इन्ही दिनों में श्राद्ध कर्म किया जाता है।

अमावस्या तिथि को उन लोगो का श्राद्ध किया जाता है जिन लोगों की मृत्यु के दिन की सही जानकारी नही होती और जिनकी अकाल मृत्य़ु होती है उनका श्राद्ध भी अमावस्या के दिन किया जाता है।

जिसने आत्महत्या की हो, या जिनकी हत्या हुई हो ऐसे लोगों का श्राद्ध चतुर्थी तिथि को किया जाता है।

जिस परिवार में पति जीवित हो और पत्नी की मृत्यु हो गई हो, तो नवमी तिथि को श्राद्ध किया जाता है।

एकादशी में उन लोगों का श्राद्ध किया जाता है जिन लोगों ने संन्यास लिया हो।

pitra paksha

पित्रपक्षा (Pitrapaksha 2018) में पितरों को खुश रहने के लिए श्राद्ध के दिनों कुछ बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है।

श्राद्ध करने के लिए शास्त्रों में बताया गया है कि दिवंगत पितरों के परिवार में या तो ज्येष्ठ पुत्र या कनिष्ठ पुत्र और अगर पुत्र न हो तो नाती, भतीजा, भांजा या शिष्य ही तिलांजलि और पिंडदान देने के पात्र होते हैं। पितरों के निमित्त सारी क्रियाएं गले में दाये कंधे मे जनेउ डाल कर और दक्षिण की ओर मुख करके की जाती है।

कई ऐसे पितर भी होते है जिनके पुत्र संतान नहीं होती है या फिर जो संतान हीन होते हैं। ऐसे पितरों के प्रति आदर पूर्वक अगर उनके भाई भतीजे, भांजे या अन्य चाचा ताउ के परिवार के पुरूष सदस्य पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर पिंडदान, अन्नदान और वस्त्रदान करके ब्राह्मणों से विधिपूर्वक श्राद्ध कराते है तो पितर की आत्मा को मोक्ष मिलता है।

श्राद्ध के दिन लहसुन, प्याज रहित सात्विक भोजन ही घर की रसोई में बनना चाहिए। जिसमें उड़द की दाल के बड़े, चावल, दूध, घी से बने पकवान, खीर, मौसमी और सब्जी जैसे तोरई, लौकी, सीतफल, भिण्डी कच्चे केले की सब्जी ही भोजन में मान्य है। आलू, मूली, अरबी तथा जमीन के नीचे पैदा होने वाली सब्जियां पितरों को नहीं चढ़ती है।

श्राद्ध करने का सही समय हमेशा जब सूर्य अच्छी तरह निकल जाएँ यानी दोपहर का पहर शुरु होने के समय ही शास्त्र सम्मत है। सुबह-सुबह अथवा 12 बजे से पहले किया गया श्राद्ध पितरों तक नहीं पहुंचता है और न ही पितरो को मोक्ष मिलता है और ही उनका आशीर्वाद।

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