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भगवान परशुराम जीवनी और क्यों काट डाला उन्होंने अपनी ही माँ का सर!

भगवान परशुराम के जीवन से जुड़े कुछ तथ्य:

भगवान् परशुराम (parshuram) त्रेता युग (रामायण काल) के एक ब्राह्मण थे। उन्हें विष्णु का छठा अवतार भी कहा जाता है। पौरोणिक कथाओ के अनुसार उनका जन्म भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को हुआ था। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार थे।

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पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम, जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जमदग्नि और शिवजी द्वारा प्राप्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम (parshuram) कहलाये। उन्होंने आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त की। भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार का वर दिया।

वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। वह स्त्रियों का बहुत सम्मान करते थे। उन्होंने अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था।

कहाँ कहाँ की जाती है विशेष रूप से इनकी पूजा:

परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। वे धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान परशुराम (parshuram) ने तीर चला कर गुजरात से लेकर केरला तक समुद्र को पीछे धकेलते हुए नई भूमि का निर्माण किया। इसी कारण कोंकण, गोवा और केरला मे भगवान परशुराम वंदनीय है। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का सम्मान करते थे और कभी भी उनकी आज्ञा की अवहेलना नहीं करते थे।

उनका लक्ष्य सारी सृष्टि को जीवन प्रदान कराने का था। उनके विचारो के अनुसार एक राजा को वैदिक धर्म का पालन करना चाहिए नाकि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना चाहिए। वह ब्राह्मण के रूप जन्मे अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी जाना जाता है।

यह भी ज्ञात है कि परशुराम (parshuram) ने अधिकांश विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थी। वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते थे और उनसे बात कर सकते थे।

उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों को ही दी। लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं जैसे भीष्म और कर्ण।

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क्यों दिया भगवान परशुराम ने कर्ण को श्राप:

कर्ण क्षत्रिय वर्ण के थे लेकिन कर्ण को लगता था के वह शूद्र वर्ण के है। उन्होंने भगवान् परशुराम से अपने शूद्र वर्ण होने की बात छुपाई और उनसे सैन्यशिक्षा प्राप्त की। किन्तु जब भगवान् परशुराम (parshuram) को यह ज्ञात हुआ के कर्ण शूद्र वर्ण के है तो उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया की उनका सिखाया हुआ सारा ज्ञान उसके किसी काम नहीं आएगा जब उसे उसकी सर्वाधिक आवश्यकता होगी। इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण और अर्जुन आमने सामने होते है तब वह अर्जुन द्वारा मार दिया जाता है क्योंकि उस समय कर्ण को ब्रह्मास्त्र चलाने का ज्ञान ध्यान में ही नहीं रहा।

क्यों काटा भगवान् परशुराम ने अपनी ही माँ का सर:

parshuram and renuka

ऋषि यमदग्नि और माता रेणुका के पांच पुत्र थे: रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्‍वानस और परशुराम।
परशुराम का नाम राम था लेकिन भगवान् शिव द्वारा प्रदान किये अमोघ परशु को सदैव धारण करने के कारन इनका नाम परशुराम पड़ा।

दुर्वासा ऋषि की भाति भगवान् परशुराम (parshuram) भी अपने क्रोधित स्वभाव के कारण जाने जाते है। एक बार कार्तवीर्य ने परशुराम की अनुपस्थिति में आश्रम उजाड़ डाला था जिससे परशुराम ने क्रोधित होकर उसकी सहस्त्र भुजाओ को काट डाला था। कार्तवीर्य के सम्बन्धियों ने प्रतिशोध की भावना से जमदग्नि का वध कर दिया था। क्रोधित होकर परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर दिया था और पांच झीलों को खून से भर दिया था।

एक समय की बात है परशुराम (parshuram) की माँ माता रेणुका पानी भरने के लिए नदी के किनारे गयी तो वहां पानी में खेल रहे सुन्दर राजकुमार को देखकर उनका मन भटक गया कर वह उनपर मोहित हो गयी। दूसरी और ऋषि जमदग्नि रेणुका का इंतजार कर रहे थे जब वह काफी देर बाद वापिस लौटी तो इन्होने अपनी दिव्या शक्ति से देख लिया था के उन्हें आने में देरी क्यों हुई।

तब ऋषि जमदग्नि ने अपने बड़े पुत्र को अपनी माँ को मारने के लिए कहाँ लेकिन मातृ प्रेम के कारण उसने अपनी माँ का वध करने से मन कर दिया। इसप्रकार बारी बारी से अपने सभी पुत्रो को अपनी माँ का वध करने को कहाँ। वैदिक संस्कृत के अनुसार किसी स्त्री की हत्या करना महापाप है और यहां तो ऋषि ने अपने पुत्रो को उनकी माँ का वध करने की बात कही थी। दूसरी और पिता के आदेश की अवहेलना करना भी एक पाप है। तब ऋषि जमदग्नि ने अपने सबसे छोटे पुत्र परशुराम को अपने चारो भाइयो और अपनी माँ का वध करने के लिए कहाँ।

भगवान परशुराम (parshuram) ने अपने पिता की शक्तियों के बारे में सोचा अगर मैं पिता की आज्ञा की अवहेलना करुगा तो मुझे श्राप मिलेगा और अगर मैं आज्ञा का पालन करुगा तो मुझे वरदान मिलेगा। जब पिता जी मुझे वरदान मांगने को कहेगे तब मैं अपने चारो भाइयो और माँ का जीवन वापिस मांग लगा ।इसलिए परशुराम ने अपनी माँ और भाइयों को मार डाला।

ऐसा देख कर ऋषि जमदग्नि प्रसन्न हो गए और परशुराम को वर मांगने को कहाँ। तब भगवान् परशुराम ने अपनी माँ और चारो भाइयों का जीवन मांग लिया और साथ ही इस बात का किसी को याद न रहने और अजय होने का वरदान भी माँगा। उनके पिता ने उनको यह वरदान दे दिया।

भागवत पुराण की इस कथा के अनुसार परशुराम अपने पिता की तपस्या की शक्ति से पूरी तरह से अवगत थे और इसीलिए उन्होंने अपनी माँ को मारने का फैसला लिया था।

भगवान परशुराम (parshuram) जन्म कथा:

प्राचीन काल में कन्नौज में गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषी के साथ कर दिया। सत्यवती के विवाह के पश्‍चात् वहाँ भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा। इस पर सत्यवती ने अपनी माता के लिये एक पुत्र की याचना की। भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करना और तुम अपनी माता की कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना। फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं में उपस्थित पानी पी लेना।

इधर जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान होने का चरु दिया है तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया। इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया। योगशक्‍ति से भृगु को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास आकर बोले कि पुत्री! तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है। इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी।

इस पर सत्यवती ने भृगु से विनती की कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे। भृगु ने उसकी विनती स्वीकार कर ली। समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ। जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे। बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुए जिनके नाम थे – रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्‍वानस और परशुराम। और भगवान् परशुराम ने ब्रह्म होकर भो क्षत्रिया आचरण का पालन किया।

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