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संतान प्राप्ति के लिए किया जाने वाला अहोई अष्टमी व्रत, कथा एवं महत्व | AHOI ASHTAMI VRAT

हिन्दू धर्म में व्रत, उपवास और सात्विक पूजा पाठ को सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता हैं। घर की इस्त्रियों को परिवार के सुख और समृधि के लिए कई रीती रिवाजों का पालन करना पढता है। उन्ही में से एक व्रत अहोई अष्टमी का व्रत है। जिसको सभी इस्त्रियों को पूरी श्रद्धा के साथ करना चाहिए यह व्रत परिवार की उन्नति और बढ़ोतरी के लिए किया जाता हैं। यह व्रत खासतौर पर संतान की खुशहाली के लिए किया जाता हैं यह दिवाली के त्यौहार के एक हफ्ते पहले मनाया जाता हैं।

AHOI ASHTAMI

अहोई अष्टमी व्रत महत्व  (Ahoi Ashtami Vrat Mehtav)

इस व्रत को सबसे बड़े और महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना गया है क्योकि इस व्रत में परिवार कल्याण की भावना छिपी होती हैं। इस व्रत को करने से पारिवारिक सुख प्राप्ति होती हैं और संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत को किया जाता है।

अहोई अष्टमी व्रत कब हैं

अहोई अष्टमी व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी के दिन किया जाता है इसे करवा चौथ के समान ही महान व्रत कहते हैं, यह व्रत करवा चौथ के चार दिन बाद आता हैं। अहोई अष्टमी व्रत इस वर्ष 31 अक्टूबर, 2018 दिन बुधवार को मनाया जायेगा।

अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त

पूजा का शुभ समय शाम 5 बजकर 45 मिनट से रात्री 7 बजकर 2 मिनट तक है

अष्टमी तिथि 31 अक्टूबर 2018 सुबह 11 बजकर 09 मिनट से शुरु होकर 1 नवम्बर 2018 को सुबह 9 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी।

अहोई अष्टमी व्रत पूजा विधि

अहोई अष्टमी व्रत में सभी माताएं निराहार रहकर अपनी संतान की आरोग्य प्राप्ति और लंबी आयु के लिए भगवान से प्रार्थना करती है। इस व्रत के दिन सभी स्त्रियां ना तो जल ग्रहण करती हैं नहीं भोजन रात के समय चंद्रमा के उदय होने के बाद ही दीवार पर बनी हुई माता की मूर्तियों या चित्रों के सामने एक लोटे में जल भरकर दें। चांदी की मूर्ति और दो गुड़िया रखकर मौली के साथ उसे बांध दें।

उसके बाद रोली, अक्षत आदि से माता की पूजा करें और पूजा करने के बाद दूध, भात या अन्य जो भी बनाया गया है उसे उन्हें अर्पित करें। पूजा समाप्त होने के बाद जल से भरे लोटे को चंद्रमा देवता का ध्यान करते हुए अर्ध्य दे और हाथ में गेहूं के 7 दाने रखकर अहोई माता की कथा सुनें और कथा सुनने के बाद मौली में पीरों कर माता के गले में पहना दे और अर्पित किए गए वस्त्र आदि को ब्राह्मणों को दान कर दे। यदि ब्राह्मण ना हो तो अपनी सास को भी दे सकते है और इसके बाद ही भोजन करें।

इसके प्रभाव से जिस भी स्त्री को संतान की उत्पत्ति नही हो रही होती है। उनको संतान सुख की प्राप्ति होती है अहोई अष्टमी के दिन ब्राह्मणों को कुष्मांड देने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

अहोई माता व्रत कथा

किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके 7 पुत्र थे। एक दिन साहूकार ने अपनी पत्नी को खदान में से मिट्टी खोद कर लाने के लिए कहा जैसे ही साहूकार की पत्नी ने मिट्टी खोदने के लिए कुदाली चलाई। तभी उस मिट्टी में रह रहे स्याऊ के बच्चे उसके प्रहार से मर गए। जब साहूकार की पत्नी ने स्याऊ के बच्चों को मरा हुआ देखा तो उसे बहुत दुख हुआ। परंतु वह कुछ नहीं कर सकती थी जो कुछ हुआ वह सब अनजाने में हुआ और बहुत दुखी मन से वह घर को लौट आई और पश्चाताप करने लग गई और इसी वजह से खोदी हुई मिट्टी को भी घर नहीं लेकर आई।

इसके बाद जब स्याऊ अपने घर आई और उसने अपने बच्चों को मरा हुआ पाया तो वह बहुत दुखी मन से विलाप करने लगी और उसने ईश्वर से प्रार्थना की थी। जिसने मेरे बच्चों को मारा है उसे बहुत दुख भोगना पड़ेगा और उसको भी अपनी संतान का वियोग सहना पड़ेगा स्याऊ के श्राप से एक वर्ष के अंदर ही सेठानी के सातों पुत्रों की मृत्यु हो गई और इस घटना से सेठ सेठानी दोनों ही बहुत दुखी हुए और दोनों ने किसी तीर्थ स्थान पर जाकर अपने प्राणों की आहुति देने का संकल्प किया।

मन में ऐसा निश्चय करते ही सेठ सेठानी घर से तीर्थयात्रा को निकल गये और दोनों के हृदय पूरी तरह टूट चुके थे और वह चलने में भी असमर्थ थे। इसीलिए वे रास्ते में ही मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े इन दोनों की इस अवस्था को देखकर भगवान को उन पर दया आ गई और एक आकाशवाणी हुई। हे! सेठ तुम्हारी सेठानी ने मिट्टी खोदते समय अनजाने में ही के स्याऊ के बच्चों को मार डाला था। इसी वजह से तो तुम्हे यह कष्ट सहना पड़ रहा है।

भगवान की भविष्यवाणी को दोनों ने सुना और भगवान ने दोनों से कहा की तुम दोनों अपने घर जाओ और जाकर गाएँ की सेवा करो और अहोई अष्टमी आने पर विधि विधान पूर्वक अहोई माता की पूजा करना और किसी का बुरा मत करना। यदि तुम ऐसा करोगे तो तुमको संतान सुख की प्राप्ति हो जाएगी। इस आकाशवाणी को सुनकर सेठ सेठानी दोनों घर गए और उन्होंने पूरे विधि विधान के साथ अहोई अष्टमी का व्रत किया और सभी प्राणियों पर दया भाव रखा।

इससे सेठ सेठानी पहले की तरह पुत्रवान हो गये और सभी सुखों को भोगकर अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुए।

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