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जाने कुंडलिनी की जागृति का सही अर्थ

Awakening of Kundalini | Kundalini Jagran

जो कोई भी कुंडलिनी के बारे में जानता है और इसमें विश्वास करता है, उसमे कुंडलिनी को जागृति करने की एक छिपी इच्छा अवश्य होती है। कहा जाता हैं कि एक बार कुंडलिनी के जागृत होने के बाद यह एक औसत मनुष्य को सर्वोच्च रूप में बदल देती है। यही वजह है कि दुनिया भर के बहुत से लोग दृढ़ संकल्प के साथ इस कार्य को पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं। इसी के बिच हम सब में से बहुत कम लोग कुंडलिनी के बारे में जानते हैं, और कुंडलिनी जागृत होने का मतलब जानना चाहते है।

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कुंडलिनी की जागृति को दो अलग-अलग तरीकों से वर्णित किया गया है।

हिंदू धर्म के अनुसार कुंडलिनी की जागृति

पहला विवरण धर्म या धार्मिक किताबों से प्राप्त किया जा सकता है। यह कुंडलिनी को सात चक्रों में परिभाषित करता है जो मानव शरीर के अंदर मौजूद होते हैं। यह चक्र ऊर्जा के स्रोत हैं जो विशिष्ट भावनाओं द्वारा निर्देशित होते हैं। सही प्रकार की मानसिकता और भावनात्मक संतुलन को बनाए रखने से, हम इन चक्रों में ऊर्जा का उचित प्रवाह सुनिश्चित करते हैं।

मानव शरीर के सात चक्रो में से कुंडलिनी के साथ बहुत करीबी रूप से दो चक्र जुड़े होते हैं-

सहस्रार चक्र: यह हमारे सिर के ताज पर स्थित होता है। इसे “हजार पंखुडिय़ों वाले कमल” या “ईश्वर का द्वार” भी कहा जाता है।

मूलाधार चक्र: यह हमारी रीढ़ की हड्डी के आधार पर स्थित है। इसे पशु और मानव चेतना के बीच सीमा निर्धारित करने वाला माना जाता है। स्वाभाविक रूप से मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक ऊर्जा बहती है।

इन दोनों चक्रो के बिच में स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्ध चक्र और आज्ञाचक्र स्थित होते है।

कुंडलिनी एक निष्क्रिय ऊर्जा है जो मूलाधार चक्र में रहती है। इस ऊर्जा को सोती हुई मादा सांप के रूप में देखा जाता है। इसलिए, कुंडलिनी जागृत करना सांप को जागने और सहस्रार चक्र से मूलाधार चक्र तक मार्गदर्शन कराने जैसा है। दूसरे शब्दों में कहे तो, कुंडलिनी जागृति द्वारा हम मूलाधार चक्र में इस तीव्र निष्क्रिय ऊर्जा को सक्रिय करते हैं और इसे सहस्रार चक्र को निर्देशित करते हैं। जिससे इसका निवास बदलता है और यह चक्र के साथ एकजुट हो जाती है।

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परंपरागत भारतीय चिकित्सा के अनुसार कुंडलिनी की जागृति

पारंपरिक भारतीय चिकित्सा और आध्यात्मिक विज्ञान के अनुसार इसे तीन खंडों में विभाजित किया जा सकता है। बाएं और दाएं हिस्से को इडा और पिंगला कहा जाता है। जो की खोपड़ी के आधार से पीठ के निचले हिस्से की ओर तक जाती हैं। जिनसे होकर सभी धमनियां गुजरती हैं। जो मानव शरीर में ऊर्जा के प्रवाह का मार्ग हैं। मानव शरीर में कुल मिलाकर 72,000 नाड़ियां होती हैं।

कशेरुका स्तंभ के मध्य भाग को सुषुम्ना कहा जाता है। इदा और पिंगला के विपरीत, सुष्मुना में एक चिपचिपा पारदर्शी द्रव होता है और इस के शीर्ष पर, एक गाँठ की तरह संरचना होती है। जो तरल पदार्थ को मस्तिष्क में प्रवेश करने से रोकती है और इसके आधार पर एक
चक्राकार मांसपेशी होती है। यही मांसपेशी तरल पदार्थ को बरकरार रखने में मदद करती है।

इस मांसपेशी की संरचना आराम करते हुए सांप जैसी दिखाई पड़ती है। जबकि इसके आखरी सिरे पर एक नोक होती है जो की नीचे की तरफ झुकी होती है और इसी को कुंडलिनी कहा जाता है। कुंडलिनी जागृत होने पर मांसपेशी के इस हिस्से की नोक की स्थिति नीचे से ऊपर की और हो जाती है।

कुंडलिनी जागृति से मांसपेशी की नोक सुषुम्ना के आधार से सीधे संपर्क में आ जाती है। मांसपेशी की नोक तरल पदार्थ को सुषुम्ना में अधिक मात्रा में बढ़ाने लगती है। जिससे यह द्रव शीर्ष पर मौजूद गाँठ को पार करता है और खोपड़ी में प्रवेश कर जाता है। यह खोपड़ी के चारों ओर अपना रास्ता बनाता है और ब्राह्मणंद्र के माध्यम से निकलता है, जो खोपड़ी में स्थित एक छोटा छेद है। यह छेद भौहें के बीचो-बिच में स्थित होता है।

फिर यह तरल निचे की और बहते हुए गाल, गर्दन और पेट से होते हुए अंत में उसी सांप जैसी चक्राकार मांसपेशी तक जाता है जहां से यह क्रिया शुरू हुई थी और यह पूरी द्रव चक्र की प्रक्रिया लगातार जारी रहती है। इसी को कुंडलिनी जागरण कहा जाता है।

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कुंडलिनी की जागृति के बाद क्या होता है?

कुंडलिनी की परिभाषा और इसे जागृत करने की विधि एक दूसरे तरीको से काफी हद तक भिन्न हो सकती है, लेकिन इसके प्रभाव लगभग एक जैसे ही होते हैं। धार्मिक और चिकित्सकीय विशेषज्ञों का मानना ​​है कि कुंडलिनी जागृत होने से शरीर के साथ-साथ व्यक्ति की मानसिकता भी पूरी तरह से बदल जाती है।

बाहरी रूप से यह परिवर्तन महत्वपूर्ण नहीं हो सकते हैं लेकिन क्षमताओं के अनुसार यह परिवर्तन चरम होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि जिसने अपनी कुंडलिनी जागृत की है, वह अपने शरीर और दिमाग को इस तरह से नियंत्रित करने में सक्षम है कि वह अपनी इच्छा के अनुसार भोजन, हवा और पानी जैसे मौलिक चीजों के सेवन को सीमित कर सकता है। और फिर भी स्वस्थ रह सकता है। वह अपनी भावनाओं को काट सकता है और फिर भी अपनी संवेदना बनाए रख सकता है। वह अपने शरीर को जमीन पर बनाये रखे अपनी आत्मा को शरीर से बाहर भेज ब्रह्मांड की यात्रा करने में सक्षम हो जाता है। उसे अपार ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, और संभवतः वह भगवान के साथ भी एक बन जाता है।

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कुंडलिनी की जागृति की प्रक्रिया क्या है?

अन्य धार्मिक प्रक्रियाओं की तरह कुंडलिनी जागृति में किसी प्रकार की पूजा याचना की आवश्यकता नहीं है। इसमें व्यक्ति को अत्यधिक रूप से ध्यान करने की आवश्यकता है। उन्हें अपनी शारीरिक स्थिति को एक शीर्ष में लेजाने के लिए आसन और प्राणायामों को भी
पूरी तरह से सिखने की आवश्यकता है।

उसे अपनी जीवन शैली में बदलाव लाने की जरूरत है। और यह सब एक अनुभवी गुरु की उपस्थिति और मार्गदर्शन में किया जाना चाहिए।

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