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विभूति क्या है और भगवान शिव से इसका संबंध

Bhagwaan Shiv Ki Bivhuti

यह एक पवित्र राख है जिसका उपयोग भगवान की शक्ति या प्रकृति की सर्वोच्च आध्यात्मिक शक्ति की पहचान के रूप में किया जाता है। इसका मतलब है कि कुछ ऐसा है जो प्रबल है, शक्तिशाली है और अति महान है।

विभूति का शाब्दिक अर्थ

विभूति शब्द ’विभु’ से आया है जिसका अर्थ है अनन्त, सर्वोच्च, आत्मा, सभी का भगवान। सरल शब्दों में, विभु का अर्थ है भगवान जैसा। विभूति मूल रूप से ईश्वर की सर्वोच्च शक्ति, उपस्थिति और अभिव्यक्ति का प्रतिक है।

उपासकों दुबारा विभूति को शरीर पर लगाना

अपने शरीर पर राख लगाकर सार्वजनिक रूप से घूमना ज्यादातर लोगों को अजीब और अंधविश्वासी लगता है लेकिन अनुयायी इसे परमात्मा के प्रति अपने समर्पण के प्रतीक के रूप में लेते हैं।

विभूति पहनना रहस्यमय और अलौकिक लगता है। लेकिन इसके पीछे कोई वैज्ञानिक और व्यावहारिक उद्देश्य भी हो सकता है जैसा की सभी जानते है। भगवान् शिव को एकांत बहुत ही पसंद है और उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनके अधिकांश भक्त सुदूर पहाड़ों, हिमालय और जंगलों में रहते हैं। ऐसे क्षेत्रो में ठंड, संक्रमण, कीट और सांप के काटने का डर बना रहता हैं। जिसके कारण एक आम इंसान को विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसी लिए ऐसा माना जा सकता है की शरीर पर विभूति सर्दी, संक्रमण, सांप और कीड़ो के काटने से बचने के लिए भी लगाई जा सकती है।

वास्तव में, मनुष्यों में विभु है क्योंकि उनके पास एक आत्मा है, जिसके कारण मनुष्य भगवान का एक पहलू है। उनके पास सर्वशक्तिमान भगवान् की शक्तियों को रखने की क्षमता है लेकिन अहंकार की अभिव्यक्ति मनुष्यों को उनकी क्षमता हासिल नहीं करने देती। और यह प्राणियों को नश्वर संसार से जोड़ता है। इसलिए भौतिकवादी दुनिया से मुक्ति पाने और ईश्वर की शक्ति को अनुभव करने के लिए हमें अहंकार से मुक्त होने की आवश्यकता है।

पवित्रता का प्रतीक

विभूति एक राख है जो हिंदू धर्म और शिव के अनुयायियों के लिए उच्च महत्व रखता है। यह शुद्धता, समानता, सुरक्षा, बलिदान और शक्ति का प्रतीक है। यह शवों के अवशेषों, गाय के गोबर को जलाने और यज्ञ में आहुति देने से उत्पन होती है। भक्त विभिन्न उद्देश्यों के लिए इसका उपयोग करते हैं।

bivhuti

– यह भगवान शिव का प्रतीक है जो सबसे अलग है और बुराई का त्याग करते है।

– शरीर पर निशान के रूप में।

– शरीर से आध्यात्मिक ऊर्जा के अपव्यय को रोकने के लिए।

– चिकित्सा के लिए, दवा के रूप में।

– नकारात्मक शक्तियों से एक ढाल के रूप में बचने के लिए।

– भौतिकवाद के मूल्य और उसकी अपूर्णता को चिह्नित करने के लिए।

विभूति का भगवान शिव से संबंध

हर अंत एक नई शुरुआत सुनिश्चित करता है और भगवान शिव उस परिवर्तन और विनाश के स्वामी हैं। उनकी तीसरी आंख सर्वशक्तिमान और ज्ञान की आंख है जो सब कुछ राख में बदलने की शक्ति रखती है। हर चीज का एक अंत होता है और जब समय आता है, तो वह सब कुछ राख में बदल देते है। किंवदंती कहती है कि एक बार भगवान शिव ने ब्रम्हा, विष्णु और सभी लोकों को राख में बदल दिया था। फिर उन्होंने अपने शरीर पर सर्वोच्च शक्ति के प्रतीक के रूप में राख को रगड़ दिया। राख इस बात का प्रतीक भी है की शिव का क्रोध परिवर्तनकारी भी है यह सिर्फ विनाशकारी नहीं है। वह वस्तुओं में मौजूद अशुद्धियों को राख में नष्ट कर देते है और उन्हें शुद्ध और चमकदार बना देते है।

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हिंदू धर्म में जीवन और अस्तित्व में सब कुछ अंततः जलकर राख में बदल जाता है। हमारे जले हुए अवशेषों के साथ पीछे बचता है तो सिर्फ हमारे कर्म, इच्छाएं और संस्कार। हमारे पिछले जीवन के अवशेष के रूप में हम उन्हें नए जीवन में ले जाते हैं। राख पहनना भी नश्वर जीवन के इस अंतिम सत्य की याद दिलाता है, जो सकारात्मक रूप से मोह का त्याग कर जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। यह एक इशारा है की हमें वासना और इच्छाओं की आग में जले बिना अधिक जिम्मेदारी से जीवन यापन करना चाहिए।

ब्रह्मचारी विभूति को त्याग, वैराग्य और भगवान शिव की भक्ति के प्रतीक के रूप में पहनते हैं। वे अपने शरीर पर राख को इस प्रतीक के रूप में लगते हैं कि उन्होंने खुदसे और अपने नाम से जुड़े किसी भी लगाव का त्याग कर दिया है। और ऐसा कर उनके शरीर के अभिसरण का पुनर्जन्म होता है जैसे कि अध्यात्म और त्याग की आग में शरीर को भस्म कर उसका दाह संस्कार किया गया हो।

विभूति के आठ प्रकार

विभूति भगवान् का प्रतीक है, जो एक नई शुरुआत के लिए सृजन के साथ-साथ नष्ट करने की शक्ति रखती है। शक्ति जो प्रकृति में, मनुष्यों में, सृष्टि में और देवत्व में प्रकट होती है। विभूति का अर्थ है प्रकाश या पूर्णता की आभा। विभूति की आठ शक्तियाँ इस प्रकार हैं।

अणिमा- छोटा बनने की शक्ति

प्राप्ति- वृद्धि करने की शक्ति

पराक्रम्य- इच्छा प्रकट करने और इच्छाओं को पूरा करने की शक्ति

लघिमा- अत्यधिक हल्के बनने की शक्ति

इसित्व- आधिपत्य, महान अधिकार और आदेश की शक्ति

वसित्व- मोहित करने की शक्ति, मंत्रमुग्ध करना, बहकाना

महिमा- राजसी बनने की शक्ति या शक्ति और आकार में बढ़ने की शक्ति

गरिमा- ऐसी शक्ति जिसे कोई हिला नहीं सकता

हम राख से पैदा हुए हैं और हम राख में नष्ट हो जाते हैं। हम मानते हैं कि आग शुद्ध होती है और जो चीज आग को छूती है वह भी शुद्ध हो जाती है। यही कारण है कि जो मर जाते हैं उन्हें शुद्ध करने के लिए हम उनका दाह संस्कार करते हैं। पिछले जन्मों की अशुद्धियाँ तो दाह-संस्कार के बाद नष्ट हो जाती हैं, लेकिन अंत में जो बचता है वह केवल आत्मा है, विभूति है, जो अनंत काल तक शुद्ध है।

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