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भृगु संहिता का विज्ञान – यह मानवता के भविष्य की भविष्यवाणी कैसे करता है

Bhrigu Sanghita Ka Vigyaan:

भृगु ऋषि की कथा

शिव के सात शिष्यों जिन्हे सप्त ऋषि नाम से भी जाना जाता है में से भृगु ऋषि भी एक शिष्य है। शिव के शिष्यों की दैनिक दिनचर्या में से एक उनके तीन बार चारों ओर घूमने और उनसे प्रार्थना करना थी। भृगु, अन्य ऋषियों की तरह शिव के एक सच्चे भक्त थे। वह शिव की भक्ति में इतने मगन थे कि वह शिव की पत्नी पार्वती को अनदेखा करते थे। एक दिन, उन्होंने सोचा, “मुझे पार्वती से कुछ नहीं चाहिए। तो मुझे उनके चारों ओर चक्र लगाने की क्या आवश्यकता है? मैं केवल शिव के चारों ओर जाऊंगा। इसलिए, वह जब भी शिव के चक्र लगते थे तो पार्वती से अलग होने के लिए कहते थे। इस बात ने पार्वती को क्रोधित कर दिया, और उन्होंने शिव से अलग होने से इंकार कर दिया। भृगु ने फिर खुद को एक पक्षी में बदल दिया और शिव के चारों ओर चक्र लगाने लगे। शिव ने इस स्थिति को बहुत ही हल्के में लिया, जबकि पार्वती का क्रोध बढ़ता जा रहा था।

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यह जानने के लिए कि अब भृगु क्या करेंगे, शिव ने पार्वती को अपनी गोद में बिठा लिया, और भृगु के लिए थोड़ी सी भी जगह नहीं छोड़ी। फिर, भृगु ने खुद को एक मधुमक्खी में बदल दिया और शिव के चारों ओर घूमने लगे। इस घटना ने पार्वती को और भी अधिक क्रोधित कर दिया। दूसरी तरफ, शिव खुश थे और इसे एक मजेदार तरीके से ले रहे थे। उसके बाद पार्वती ने शिव को अपने करीब खींच लिया और उन्हें खुद का हिस्सा बना दिया, वह अर्धनारी बन गए। भृगु ने फिर एक छेद बनाया और सुनिश्चित किया कि वह केवल शिव के आसपास ही घूमे। पार्वती अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सकी और उन्होंने भृगु को शाप दिया, “तुम्हारा शरीर नष्ट हो जाना चाहिए। तुम एक भी कदम नहीं उठा पाओगे, और शिव के चारों ओर जाने के बारे में भूल जाओगे। ”

भृगु की अचानक से सारी मांसपेशियों ख़तम हो गई। वह खड़ा भी हो पा रहे थे। तब शिव ने हस्तक्षेप किया और पार्वती से कहा कि भृगु ऋषि और एक महान भक्त हैं और वह भक्ति में पागल हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह पार्वती का अपमान नहीं कर रहे थे, वह केवल शिव के इर्द-गिर्द घूमना चाहते थे और यदि पार्वती ने उन्हें बताया होता कि वह भी शिव का ही हिसा है, तो वह उनके भी चारों ओर घूमते।

लेकिन शिव भी अपनी पत्नी के अभिशाप के बारे में कुछ नहीं कर सकते थे। एक समाधान के रूप में, उन्होंने भृगु को खड़े होने के लिए तीसरा
पैर दिया।

आज, जब आप कुछ शिव मंदिरों में जाते हैं, तो आपको तीन पैरों वाले व्यक्ति की एक छवि दिखाई देती होगी। वह पैर सिर्फ खड़े होने के लिए नहीं था; वह उस पैर के माध्यम से तीनों दुनिया को समझ सकते थे।

मानव चेतना

तीनों दुनिया की धारणा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने भृगु संहिता को लिखा, जो की एक मानचित्र के रूप में जानी जाती है जो बताता है की
सौर मंडल के ख़तम होने तक इंसान का क्या होगा। वह किसी एक इंसान के बारे में नहीं है। इसके बजाय, इसमें सामान्य रूप से मानवता के बारे में बात की गई है- की वह कैसे विकसित होगा, क्या करेगा, मनुष्यों के कितने प्रकार होंगे और भविष्य में क्या स्थिति होगी।

भृगु ने मानव चेतना का एक नक्शा विकसित किया – की किस तरह गर्भ एक इंसान में बदल जाएगा, और वह आगे जाकर क्या बनेगा। उन्होंने इस अवधारणा पर विस्तार किया और मानचित्र के बारे में कई लोगो को प्रशिक्षित भी किया।

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नक्शा

किसी भी मानचित्र को पढ़ना मुश्किल होता है, और उसमे प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। अपने आप को एक वैमानिकीय मानचित्र पढ़ने पर विचार करें, यह कितना जटिल होगा, अगर हम बात करे की ग्रहों के गोलाकार होने का क्या कारन है? यह कैसे घूमते है? समय क्षेत्र कैसे बदलता है? जो इसे पढ़ना जानता होगा, उसके लिए यह केवल दो मिनट का कार्य होगा है। लेकिन प्रशिक्षण के बिना, आप को मानचित्र में कुछ भी समझ आना लगभग नामुमकिन हैं। भले ही आप इसे समझने के लिए कितने भी दिन क्यों न बिताएं।

प्रशिक्षण की इस आवश्यकता को समझते हुए, भृगु ने लोगों को सहजता के कुछ नियमो के बारे में सिखाया ताकि वे इसे पढ़ सकें। क्योंकि यह पूरी तरह तार्किक नहीं था। यह ऐसा कुछ नहीं था जो पहले से ही किसी मौजूद चीज पर आधारित हो। यह एक नक्शा है जोकि बहुत ही जटिल है। और इसमें कुछ ज्ञान को समझने की आवश्यकता है कि परिस्थितियां कैसे प्रकट हो सकती हैं। कई बार व्याख्या किसी चीज को सही तरीके से समझा नहीं सकती, क्योंकि व्याख्याएं व्यक्तिपरक हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, एक मौसम विज्ञानी वर्षा की भविष्यवाणी कर सकता है, लेकिन 100% सटीक नहीं हो सकता है। दोपहर 3बजे बारिश होने के बजाय, यह 5 बजे, या थोड़ा अलग स्थान पर बारिश हो सकती है। प्रकृति की गतिशीलता कभी भी बदल सकती है।

तो क्या सबकुछ पूर्व निर्धारित है?

ऐसा नहीं है कि सबकुछ निर्धारित है। आपका भाग्य आपके कर्म पर आधारित होता है। इसे एक सॉफ्टवेयर की तरह सोचे, जहां कई प्रक्रियाएं हैं और आप एक निश्चित तरीके से कार्य करते हैं। आप कार्यो के रूप में इसमें कुछ इनपुट करते हैं, और यह आपका सॉफ़्टवेयर है जो इसे process करता है और इसके अनुसार आपको परिणाम देता है।

जब आपको कोई ज्योतिषी यह कहते हैं की, “आप इस साल तक जीएंगे,” इसका मतलब यह नहीं है कि आप उस वर्ष तक ही जीएंगे। आप अगले ही पल पहाड़ से कूद सकते हैं। आपको पता होना चाहिए कि भौतिक शरीर और मानसिक संरचनाएं आपके द्वारा बनाई गई कुछ चीजें है। और यह कुछ ऐसा है जिसे आप नष्ट कर सकते हैं। लेकिन आप अन्य पहलुओं को छू नहीं सकते। यह पहलु ही है जो आपके सॉफ्टवेयर है। और ज्योतिषी आपके पहलुओं यानि की सॉफ्टवेयर को पढ़ते हैं।

मान लें कि आपके पास कंप्यूटर पर एक सॉफ़्टवेयर स्थापित है, लेकिन कंप्यूटर क्रैश हो गया है। आप अभी भी एक नए कंप्यूटर में उस हार्ड ड्राइव को लगा सकते हैं और सॉफ्टवेयर चला सकते हैं। तो, भले ही आपका “कंप्यूटर” क्रैश हो जाए, फिर भी आपको उसी सॉफ्टवेयर के साथ एक नया “कंप्यूटर” मिल जाएगा। यहां कंप्यूटर आपका भौतिक शरीर है, और सॉफ्टवेयर आपकी आत्मा है।

यदि ज्योतिषी सच्चा हैं, और यदि आप आध्यात्मिक मार्ग पर हैं तो वे आपके भविष्य की भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। इसका कारण यह है कि आपको कर्मो की परवाह नहीं है, और आप जिस तरह से जीना चाहते हैं, आप बस उसी पर ध्यान देते हैं, आपको इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की समाज क्या कहता है। आध्यात्मिक मार्ग पर होने का अर्थ है अपने भाग्य को अपने हाथों में लेना।

अगर कोई पूछता है की सबकुछ पूर्व निर्धारित है तो इसका जवाब है, नहीं। मृत्यु भी पूर्व निर्धारित नहीं है। सब कुछ आपके द्वारा बनाया गया है। कुछ चीजें हैं जिन्हें आप अनजाने में बनाते हैं और आप इससे अनजान हो सकते हैं। लेकिन आपको पता होना चाहिए कि आप इस सब को सतर्कता से भी बना सकते हैं – जो आध्यात्मिक प्रक्रिया का उदेश्य है।

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