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छोटा चार धाम और उनकी कथा

CHOTA CHAR DHAM

भारत के उत्तराखंड में स्थित चार धाम को छोटा चार धाम(char dham) भी कहा जाता है। चार धाम स्थलों के छोटे सर्किट को बड़े सर्किट से अलग करने के लिए छोटा चार धाम कहा जाता है।

उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल मंडल में उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों में स्थित है। इस क्षेत्र के चार धाम है यमुनोत्री, गंगोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ। केदारनाथ मंदिर पांच नदियों का संगम भी है यहाँ- मंदाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी बहती थी।

मंदाकिनी के सिवाय सभी नदियाँ विलुप्त हो चुकी है। छोटा चार धाम यात्रा हर साल होती है और हर साल यहाँ लाखो की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते है।

ये छोटा चार धाम मंदिर बर्फबारी के कारण सर्दियों में बंद हो जाते हैं और गर्मियों के आगमन के साथ तीर्थयात्रियों के लिए फिर से खोल दिए जाते। मंत्रो उच्चारण व् विशेष पूजा पाठ के साथ ही मंदिर के कपाट खोले और बंद किये जाते है।

हिन्दू धर्म में चार धाम की यात्रा का बहुत महत्व है ऐसा माना जाता है के जो व्यक्ति अपने जीवन काल में चार धाम के दर्शन कर लेता है वह पापो से मुक्त हो जाता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। चार धाम स्थलों के छोटे सर्किट को बड़े सर्किट से अलग करने के लिए छोटा चार धाम कहा जाता है।

आइये जानते है चार धामों की विस्तृत कथा के बारे में:

यमुनोत्री – Yamunotri

yamunotri

भारत की पर्वत श्रृंखलाओं में बसा यमुनोत्री धाम उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित चार धाम की यात्रा का पहला पड़ाव है अर्थात चार धाम की यात्रा की शुरुआत यहीं से होती है। मदिंर का निर्माण टिहरी गढ़वाल के राजा प्रतापशाह ने सन 1919 में देवी यमुना को समर्पित कर बनवाया था।

अत्यधिक बर्फ़बारी के कारन यह मंदिर तहस महस हो चूका था तब 19वी सदी में जयपुर की महारानी गुलेरिया ने मंदिर का पूण: निर्माण कराया था।

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यह असित मुनि का निवास स्थान भी है। कहाँ जाता है के वो प्रतिदिन गंगा और यमुना नदी में स्नान किया करते थे उनके आखिरी दिनों के दौरान जब वह यमुना से गंगा की यात्रा नहीं कर सके तब गंगा नदी उनकी अपार श्रद्धा देखकर उनके आश्रम से ही अवतरित हो गयी थी।

पुराणों में यमुना को “सूर्य की पुत्री” कहाँ गया है। भगवान् सूर्य की पत्नी छाया और संज्ञा से यमुना, यम, शनिदेव एवं वैवस्वत मनु प्रकट हुए थे।

इस प्रकार यमुना यमराज और शनिदेव की बहन है। कहते है भैयादूज के दिन जो भो व्यक्ति यमुना में स्नान करता है उसे यमत्रास से मुक्ति मिल जाती है।

यमुना सबसे पहले कलिंदी पर्वत पर प्रकट हुए थी इसलिए इनको “कालिंदी” नाम से भी जाना जाता है। पुराणों के उल्लेख के अनुसार भगवान् श्री कृष्ण की आठ पटरानियों में से एक कालिंदी यमुना भी है।

महाभारत के अनुसार जब पांडव उत्तराखंड की तीर्थयात्रा पर आये थे तो वो सबसे पहले यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और अंत में बदरीनाथ की और बढे थे।

मंदिर प्रांगण में एक विशाल शिला स्तम्भ है जिसे “दिव्यशिला के नाम से जाना जाता है। मंदिर के आस पास ‘सूर्यकुंड’ ‘सप्तऋषिकुंड’ और ‘हनुमानकुंड’ आकर्षण के केंद्र है। यमुनोत्री मंदिर के कपाट वैशाख माह की “अक्षय तृतिया” को खोले जाते है व् कार्तिक माह की “यम द्वितय” को बंद किये जाते है।

गंगोत्री – Gangotri

gangotri

गंगोत्री मंदिर हिन्दुओ का पवित्र स्थल है व् भागीरथी नदी के तट पर स्थित है। चार धाम की यात्रा का यह दूसरा पड़ाव है। गंगोत्री को गंगा मैया का उद्गम स्थल भी माना जाता है।

धरती पर माँ गंगा जिस स्थान पर अवतरित हुए उसे “गंगोत्री धाम” कहाँ गया है। गंगा को भागीरथी भी कहा जाता है क्योंकी राजा भगीरथ ने ही इसे धरती पर अवतरित कराया था। गंगा में स्नान करने से सभी पापो से मुक्ति मिल जाती है या हम कह सकते है की गंगा की औषधीय गुणों से हमे सभी रोगो से मुक्ति मिल जाती है।

गंगोत्री स्थल पर राजा भगीरथ ने घोर तपस्या कर गंगा मैया को धरती पर आने के लिए विवश किया ताकि वह अपने उन पूर्वजो को मोक्ष प्रदान करा सके जो कपिलमुनि के श्राप के कारण मृत्यु को प्राप्त हो गए थे।

ऎसी मान्यता है के पांडवो ने भी महाभारत युद्ध में मारे गए अपने परिजनों की आत्मिक शान्ति के लिए महायग का आयोजन इसी स्थान पर किया था। धरती पर अवतरित होने से पहले माँ गंगा शिवजी की जटाओ में निवास करती थी तब शिवजी ने मानव कल्याण हेतु धीरे धीरे गंगा मैया को पृथ्वी पर छोड़ा।

ऐसा माना जाता है की इस स्थान से गंगा जल लेकर अगर रामेश्वरम धाम में उपस्थित शिवलिंग को अर्पित किया जाता है तो भगवान् शिवजी के गले की पीड़ा को आराम मिलता है जो समुद्र मंथन के दौरान विष पीने के कारण हुए थी।

केदारनाथ – Kedarnath

kedarnath

केदारनाथ मंदिर चार धामों में सम्मिलित होने के साथ-साथ बारह ज्योतिर्लिंग और “पंचकेदार” ( शिव की भुजाएँतुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जाता कल्पेश्वर में प्रकट हुए थे

इसीलिए श्री केदारनाथ को “पंचकेदार’ भी कहा जाता है) में से भी एक है। इन्हे “केदारेश्वर” भी कहाँ जाता है।

यह मंदिर केदार नामक पर्वत पर स्थित है। सतयुग में उपमन्यु ने एवं द्वापर में पांडवो ने यहाँ भगवान् शिव की आराधना की थी।

पुराणिक कथाओ के अनुसार जब महाभारत युद्ध समाप्त हो चूका था और पांडवो की जीत हो गयी थी। तब भगवान् कृष्ण ने पांडवो को कहाँ के युद्ध में जीत भले ही तुम्हारी हुए हो

लेकिन अपने गुरुजनो और बंधू-बांधवो को मारने के कारण तुम पाप के भागी बने हो इसीलिए तुम्हे कभी मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी।

भगवान् कृष्ण बोले की भगवान् शिव ही तुम्हे इन पापो से मुक्त करा सकते है। ऐसा सुनते ही पांडव मुक्ति पाने हेतु भगवान शिव को ढूंढने लगे।

भगवान् शिव पांडवो से बहुत क्रोधित थे क्यों के उन्होंने अपने ही कुल का कुरुक्षेत्र युद्ध में संहार किया था। भगवान् शिव भेष बदल कर हिमालय की और चले गए थे।

पांडव भी भगवान् शिव का पीछा करते करते केदारनाथ पहुंच गए। तभी भीम ने उन्हें पहचान लिया और उनको पकड़ने की कोशिश करने लगे। भगवान् शिव उससे बचने के लिए वहां से गुजर रहे पशुओ के झुण्ड में बैल बनकर छिप गए।

पांडवो के लिए पशुओ के झुण्ड में से महादेव को पहचान पाना मुश्किल था तभी भीम दो पहाड़ो के बीच पैर रखकर खड़ा हो गया। सभी पशु उनके पाँव के नीचे से निकल गए लेकिन महादेव ने ऐसा नहीं किया।

तब भीम शिव की और जाने लगे तो शिवजी उसी स्थान पर गड्ढा खोद कर धरती में समाने लगे, किन्तु भीम ने भगवान् शिव का कुल्हा पकड़ लिया।

उनकी अपार श्रद्धा देखकर महादेव को प्रकट होना पड़ा और उन्हें पापो से मुक्त किया। शिव जब बैल रूप में धरती में समा रहे थे उस समय उनके सिर का भाग नेपाल में निकला जिसे आज “पशुपतिनाथ” के रूप में पूजा जाता है। इस तरह केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की उत्त्पत्ति हुए।

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बद्रीनाथ – Badrinath

BADRINATH-MANDIR

बद्रीनाथ मंदिर जिसे “बद्रीनारायण” भी कहते है भारत के उत्तर में हिमालय की बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में बसा नीलकंठ पर्वत का पार्शव भाग है।

भगवान विष्णु को समर्पित यह स्थान समस्त हिन्दू जाती के लिए पूजनीय तीर्थस्थान है। यह मंदिर तीन भागो में विभाजित है गर्भगृह, दर्शमंड और सभामंड।

मंदिर परिसर में पंद्रह मुर्तिया है जिसमे सबसे प्रसिद्ध है भगवान् विष्णु की एक मीटर काले पत्थर की मूर्ति।

यहाँ भगवान विष्णु ध्यान मुद्रा में सुशोभित है। जिसके दाहिने कुबेर, लक्ष्मी और नारायण की मुर्तिया है। इसे धरती का वैकुण्ठ भी कहा जाता है। बद्रीनाथ धाम में श्री बद्रीनारायण भगवान की पांच रूपों में पूजा की जाती है।

विष्णु के इन पांच रूपों को “पंचबद्री” के नाम से जाना जाता है। बद्रीनाथ के मुख्या मंदिर के इलावा यहाँ और मंदिर भी है जिसमे से विशाल बद्री को विशेष रूप से पूजा जाता है।

प्राचीन ग्रंथो में इस क्षेत्र से सम्बन्धित एक कथा है, जिसके अनुसार धरम के दो पुत्र थे- नर और नारायण जिन्होंने धर्म की स्थान हेतु कई वर्षो तक यहाँ तपस्या की वह अपना आश्रम स्थापित करने के लिए कई स्थानों पर घूमे।

अंतत उन्हें अलकनंदा नदी के पीछे एक गरम और एक ठन्डे पानी का चश्मा मिला,जिसके पास के क्षेत्र में आश्रम स्थापित किया और उसे बद्री विशाल नाम दिया।

बाद में यह नर और नारायण द्वापर युग में कृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतरित हुई। जब गंगा नदी धरती पर अवतरित हुई तो यह बारह धाराओं में बट गयी। इस स्थान पर बहने वाली धारा अलकनंदा नाम से विख्यात हुई।

यही स्थल भगवान विष्णु का निवास स्थान बना और बद्रीनाथ कहलाया। प्राचीनकाल में यह स्थान जंगली बेरो से भरा रहता था इसीलिए इससे “बदरीवन” भी कहाँ जाता था। कहा जाता है व्यास जी ने महाभारत इसी जहां पर लिखी थी।

पौराणिक कथाओ के अनुसार भगवान विष्णु ने नीलकंठ के समीप बाल रूप में अवतरण किया था। भगवान विष्णु ध्यानयोग के हेतु स्थान खोज रहे थे तब उन्हें अलकनंदा नदी के समीप यह स्थान बहुत भा गया।

यह स्थान पहले शिव भूमि के नाम से प्रसिद्ध था। भगवान विष्णु नीलकंठ पर्वत के समीप बाल रूप धारण कर रोने लगे। उसी समय भगवान शिव और पार्वती भ्रमण कर रहे थे तभी उन्हें बालक के रोने की आवाज आई।

भगवान शिव तो अन्तर्यामी थे उन्होंने विष्णु भगवान की लीला के बारे में जान लिया था। जब माता पार्वती रोते हुई बालक को उठाने लगी तब शिव ने उन्हें बहुत समझाया लेकिन माता पार्वती का मन द्रवित हो उठा और उन्होंने उस बालक को गोद में उठा लिया और पूछा के बालक तुम्हे क्या चाहिए?

तो बालक ने ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया। तब माता पार्वती के अनुग्रह पर शिव ने यह स्थान भगवान विष्णु को दे दिया।

उसके बाद भगवान् विष्णु तपस्या में बैठ गए। भगवान विष्णु तपस्या में लींन थे तो बहुत हिमपात होने लगा। तब माता लक्ष्मी ने एक बेर बद्री वृक्ष का रूप ले लिया और भगवान विष्णु की हिमपात, धुप और आंधी से रक्षा करने लगी।

बहुत वर्ष बीत जाने के बाद विष्णु भगवान तपस्या से उठे तो उन्होंने देखा माता लक्ष्मी पूरी तरह से बर्फ में ढक चुकी है। उन्होंने माता के तप को देख कर कहाँ के हे देवी तुमने भी मेरे बराबर ही तप किया है

सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे साथ पूजा जायेगा। तुमने मेरी रक्षा बद्री के वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बद्री के नाथ बद्रीनाथ के रूप में जाना जायेगा। इसी तरह इस तीर्थस्थल का नाम “”बद्रीनाथ पड़ा।\

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