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देव दीपावली कब मनाई जाती है और इसमें किन देवों की पूजा की जाती है

देव दीपावली (Dev Diwali) कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। देव दीपावली दिवाली के 15 दिन बाद मनाई जाती है। इस वर्ष देव दीपावली  12 नवंबर को मनाई जाएगी। इस पर्व में मां गंगा और भगवान शिव जी की अराधना की जाती है। पोराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर दानव का वध किया था जिसके मारे जाने पर सभी देवताओं ने विजय दिवस मनाया और दीपक जलाकर भगवान शिव की आराधान की। ऐसा भी कहा जाता है की इस दिन भगवान शिव भी इस धरती पर आते हैं।

देव दीपावली शुभ मुहूर्त – शाम 5 बजकर 11 मिनट से 7 बजकर 48 मिनट तक।

पूर्णिमा तिथि प्रारंभ- 11 नवंबर को शाम 6 बजकर 2 मिनट से

पूर्णिमा तिथि समाप्त- 12 नवंबर को शाम 7 बजकर 4 मिनट तक।

काशी में क्यों मनाई जाती है देव दीपावली (Dev Diwali)

एक पौराणिक कथा के अनुसार काशी में देव दीपावली इसलिए मनाई जाती है क्योकि काशी में ही भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध करके देवताओं को स्वर्ग लोक वापस दिला दिया था। लेकिन तारकासुर के वध से उसके तीनों पुत्रों ने देवताओं से बदला लेने का प्रण लिया। इन्होंने ब्रह्माजी की तपस्या करके उन्हें प्रसन्न कर लिया और उनसे तीन नगर मांगे और कहा कि जब ये तीनों नगर अभिजीत नक्षत्र में एक साथ आ जाएं तब असंभव रथ, असंभव बाण से बिना क्रोध किए हुए कोई व्यक्ति ही उनका वध कर पाए। इस वरदान को पाकर त्रिपुरासुर खुद को अमर समझने लगे।

त्रिपुरासुर ने देवताओं को परेशान और अत्याचार करना शुरू कर दिया और उन्हें स्वर्ग लोक से बाहर निकाल दिया। सभी देवता त्रिपुरासुर से परेशान होकर बचने के लिए भगवान शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं का कष्ट दूर करने के लिए भगवान शिव स्वयं त्रिपुरासुर का वध करने पहुंचे और उसका अंत कर दिया। भगवान शिव जी ने जिस दिन इस राक्षस का वध किया उस दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा थी और तभी से काशी में कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव-दिवाली मनाने की परंपरा चली आ रही है।

माना जाता है कि इस दिन विधि-विधान के साथ पूजा करने से भी कामों में लाभ मिलता है और देवी देवताओं की कृपा बनी रहती है।

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