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देवी-देवताओं के कई हाथ और सिर होने का प्रमुख कारण

DEVI-DEVTAO KE KAI HATH AUR SEER HONE KA KARAN 

हिंदू धर्म में देवी-देवताओं को अक्सर कई बाहों के साथ चित्रित किया जाता है। ये हाथ तब दिखाई देते हैं जब वे विराठ रूप दिखते है। मानव रूप में कई भुजाओं वाले देवताओं का चित्रण कलाकार दुवारा उनकी सर्वोच्च शक्तियों को व्यक्त करने का प्रयास है। यह उनकी एक ही समय में कई कार्य करने के बल और शक्ति को दर्शाता है।

God-Vishnu

यदि आप गौर से देखेंगे तो उनके प्रत्येक हाथ में कुछ वस्तु होती है जो उस विशेष देवता के विभिन्न गुणों का प्रतीक है। तो कुछ हाथों को खाली दिखाया गया है। वही कुछ उंगलियों और हथेलियों को विभिन्न मुद्रा (स्थिति) के साथ दिखाया गया है, जो भगवान के चरित्र को दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए जब उंगलियां जमीन की ओर इशारा करती हैं, तो वे भगवान के परोपकारी स्वभाव को व्यक्त करती हैं। जबकि, जब उंगलियां आशीर्वाद के रूप में ऊपर की ओर इशारा करती हैं, तो वो भगवान के सुरक्षात्मक स्वरूप को व्यक्त करती हैं।

उनके हाथो की संख्या अलग-अलग होती है जो प्रतीकात्मकता को चित्रित करती है। आमतौर पर, देवी-देवताओं की चार भुजाएँ दिखाई जाती हैं, जिनमें प्रत्येक वस्तु का एक अलग महत्व होता है। उदाहरण के लिए भगवान गणेश के इस चित्र को देखते है।

GANESH

इसमें वह अभय मुद्रा में है। अभय मुद्रा का अर्थ है निर्भयता। इस मुद्रा में गणेश जी का निचला दाहिना हाथ उनकी कृपा, आशीर्वाद और किसी व्यक्ति के जीवन में उसकी सुरक्षा करने का प्रतीक है। वह अपने ऊपरी दाहिने हाथ में एक कुल्हाड़ी पकड़े हुए है, जो की किसी भी तरह के
बंधन को काटने का प्रतीक है। वह अपने ऊपरी बाएँ हाथ में एक डोरी रखते है ताकि वो अपने भक्तों को आध्यात्मिक मार्ग पर बांध सके। ऐसा कहा जाता है कि भगवान् गणेश अपने भक्तो को मोदक के समान मीठा फल प्रदान करते है। जिसे वह सदैव अपने बाएं हाथ में धारण करते हैं।

कई बार देवी-देवताओ को एक से अधिक सिर के साथ भी दिखाया जाता है। यह प्रतिनिधित्व उस देवता के चरित्र के विभिन्न पहलुओं का प्रतीक है। उदाहरण के लिए, जब भगवान शिव को तीन सिर के साथ चित्रित किया जाता है, तो केंद्रीय चेहरा उनके मूलभूत चरित्र को इंगित करता है वही बाकी के चेहरे उनके भयंकर और आनंदमय चरित्रों को दर्शाते हैं।

प्राचीन भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार

भगवान ब्रह्मा का पहले एक सिर ही था। जब उन्होंने अपने शरीर से एक स्त्री, शतरूपा की रचना की, तो ब्रह्मा को अपनी ही स्त्री रचना से प्रेम हो गया। वह उनकी अचरज भरी सुंदरता से अपनी आँखों को बचा नहीं सके। जैसे ही शतरूपा को शर्म महसूस हुई, उन्होंने उनसे दूर जाकर उनकी निगाहो से बचने की कोशिश की। यह माना जाता है कि शतरूपा का पीछा करने के लिए ब्रह्मा ने अपने पांच सिर बनाए वो भी प्रत्येक दिशा पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और एक ऊपर की ओर के लिए।

brahma
ब्रह्मा के इस व्यवहार ने भगवान शिव को प्रभावित किया और परिणामस्वरूप उन्होंने अपने पांचवें सिर को जोकि ऊपर की ओर था को काट दिया। इसलिए भगवान ब्रह्मा को चार सिर के साथ चित्रित किया गया है।

हिंदू देवी-देवताओं की तरह, वेदों में राक्षसों के भी कई सिर और हाथो का उल्लेख हैं। यह चित्रण उनकी अलौकिक शक्ति को व्यक्त करने के लिए किया जाता है।

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