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देवशयनी एकादशी (DEVSHAYANI EKADASHI) का महत्व और पूजा विधि

DEVSHAYANI EKADASHI VRAT KATHA AUR POOJA VIDHI

DEVSHAYANI EKADASHI
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आषाढ़ महीने की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु चार मास के लिये सो जाते हैं इसलिये इसे देवशयनी और पदमा एकादशी भी कहा जाता है। इन दिनों में विवाह, दीक्षाग्रहण, ग्रहप्रवेश, यज्ञ आदि धर्म कर्म से जुड़े जितने भी शुभ कार्य होते हैं । वे रोक दिए जाते है पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्री हरि के शयन को योगनिद्रा भी कहा जाता है। इस साल देवशयनी एकादशी (DEVSHAYANI EKADASHI) 23 जुलाई को है परन्तु एकादशी 22 जुलाई को दोपहर 2:47 बजे से प्रारंभ होकर 23 जुलाई को शाम 4:23 बजे समाप्त होगी । आइये अब जानते हैं देवशयनी एकादशी की कथा और इसके महत्व के बारे में।

देवशयनी एकादशी (DEVSHAYANI EKADASHI) व्रत व पूजा विधि

देवशयनी एकादशी के दिन प्रात:काल उठकर स्नानादि के पश्चात घर में पवित्र जल का छिड़काव करके पूजा की शुरुआत करनी चाहिये । पूजा स्थल पर भगवान श्री हरि यानि विष्णु जी की सोने, चांदी, तांबे या फिर पीतल की मूर्ति स्थापित करें और पूजा आदि करे । पूजा के बाद व्रत कथा अवश्य सुननी चाहिये। आरती करने के बाद सभी को प्रसाद देना चाहिये और अंत में सफेद चादर से ढंके गद्दे तकिये वाले पलंग पर श्री विष्णु को शयन कराना चाहिये।

देवशयनी एकादशी (DEVSHAYANI EKADASHI) व्रत कथा

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार देवशयनी एकादशी का बहुत महत्व है। क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु चार मास के लिये योगनिद्रा में चले जाते हैं जिस कारण कोई भी शुभ कार्य इस दौरान नही किया जा सकता। इसके बाद भगवान विष्णु कार्तिक मास की शुक्ल एकादशी जिसे प्रबोधनी एकादशी कहा जाता है को निद्रा से उठते हैं उसके बाद फिर से शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। देवशयनी एकादशी के महत्व को इस पौराणिक कथा के जरिये और भी अच्छे से समझा जा सकता है।

सतयुग की बात है कि माधांता नाम के चक्रवर्ती सम्राट हुआ करते थे, वह बहुत ही पुण्यात्मा, धर्मात्मा राजा थे, प्रजा भी उनके राज में सुखपूर्वक अपना गुजर-बसर कर रही थी, एक समय उस राजा के राज्य में तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई और अकाल पड़ गया। प्रजा अन्न की कमी के कारण अत्यंत दुखी हो गई। अन्न के न होने से राज्य में यज्ञादि भी बंद हो गए। एक दिन प्रजा राजा के पास जाकर कहने लगी कि हे राजा! सारी प्रजा त्राहि-त्राहि पुकार रही है । राजा बेचारे पहले से ही दुखी थे, जनता के आने से उनका दुख और बढ़ गया। अब राजा को न रात को नींद न दिन में चैन हमेशा इसी परेशानी में रहते कि मुझसे ऐसा कौनसा अपराध हुआ जिसका दंड मेरी प्रजा को भोगना पड़ रहा है।

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इतना कहकर राजा कुछ सेना साथ लेकर वन की तरफ चल दिया। वह अनेक ऋषियों के आश्रम में भ्रमण करता हुआ अंत में ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचा। वहां राजा ने घोड़े से उतरकर अंगिरा ऋषि को प्रणाम किया। मुनि ने राजा को आशीर्वाद देकर कुशलक्षेम के पश्चात उनसे आश्रम में आने का कारण पूछा। राजा  ने ऋषि को अपने राज्य का सारा हाल बतला दिया । और बोले अब मैं आपके पास इसी संदेह को निवृत्त कराने के लिए आया हूं। कृपा करके मेरे इस संदेह को दूर कीजिए। साथ ही प्रजा के कष्ट को दूर करने का कोई उपाय बताइए। इतनी बात सुनकर ऋषि कहने लगे कि हे राजन! सतयुग में ज्ञान ग्रहण करने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को ही होता है और अन्य वर्णों विशेषकर शूद्रों के लिये तो यह वर्जित है और इसे पाप माना जाता है। ऋषि कहने लगे राजन आपके शासन में एक शूद्र नियमों का उल्लंघन कर शास्त्र शिक्षा ग्रहण कर रहा है। इसलिए यदि आप प्रजा का भला चाहते हो तो उस शूद्र का वध कर दो।

इस पर राजा कहने लगा कि महाराज मैं उस निरपराध तपस्या करने वाले शूद्र को किस तरह मार सकता हूं। आप इस दोष से छूटने का कोई दूसरा उपाय बताइए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! यदि तुम अन्य उपाय जानना चाहते हो तो सुनो। तब अंगिरा ऋषि कहने लगे एक उपाय है राजन। तुम आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी के व्रत का विधिवत पालन करो तुम्हारे राज्य में खुशियां पुन: लौट आयेंगी। राजा वहां से लौट आया और आषाढ़ महीने की शुक्ल एकादशी आने पर व्रत का विधिवत पालन किया। राज्य में जोर की बारिश हुई और प्रजा फिर से धन-धान्य से निहाल हो गई।

अत: देवशयनी एकादशी (DEVSHAYANI EKADASHI) का व्रत सब मनुष्यों को करना चाहिए। यह व्रत इस लोक में सुख देने वाला और परलोक में मुक्ति को देने वाला है। इस कथा को पढ़ने और सुनने से मनुष्य के समस्त पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं।

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