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जानिए धनु संक्रांति कब है और महाभारत काल से इसका क्या सम्बन्ध है

Dhanu Sankranti 2018

तिथि                             16 दिसंबर 2018
दिन                                    रविवार

dhanu sankranti

धनु संक्रांति (Dhanu Sankranti) सूर्य ग्रह के धनु राशि में प्रवेश करने से वाले दिन मनाई जाती है और जिस भी महीने में ऐसा होता है उस महीने को “शुभमाह” या “धनुमाह” भी कहा जाता है। वर्ष की आखिरी संक्रांति पर सूर्य ग्रह वृश्चिक राशि से निकलकर अपने मित्र ग्रह गुरु की राशि धनु में पहुंच जाते है।

हिंदूधर्म में सूर्यपंचांग के अनुसार धनुसंक्रांति के दिन से ही हिन्दुपंचांग के नौवें महीने का आरंभ हो जाता है। धनु संक्रांति के दिन सूर्यदेव की आराधना का बहुत महत्व है। इस दिन सूर्यदेव की पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है।  इस दिन पवित्र नदियों के जल में स्नान करने से मनुष्यों के द्वारा किये गये बुरे कर्म या पापों से मुक्ति मिलती है।

धनु संक्रांति के दिन ओड़ीसा राज्य में भगवान जगन्नाथ की पूजा की जाती है। ओड़ीसा राज्य में धनु संक्रांति के महीने को “पौषमाह” के रूप मे मनाया जाता है। इस त्यौहार को ओड़ीसा राज्य में वहां के किसान अपनी फसल की कटाई करने के बाद मानते है।  इस दिन एक खास तरह का मीठा पकवान भी बनाया जाता है, जिसे “मीठाभात” कहा जाता है। सबसे पहले भगवान जगन्नाथ को इसका भोग लगाया जाता है और उसके बाद सभी को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

lord jaggannath
Apnisanskriti.com

धनु संक्रांति (Dhanu Sankranti) के उत्सव को पुरे धूम धाम के साथ मनाया जाता है और ओड़ीसा राज्य के सब लोग इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते है। यह त्यौहार 10-12 दिन तक चलता है। इस उत्सव के दौरान आसपास का लगभग 5-6 किलोमीटर का क्षेत्र खुले रंगमंच बना कर अलग अलग कार्यक्रम आयोजित किये जाते है।

धनु संक्रांति (Dhanu Sankranti) के दिन की विशेषताएं

इस दिन प्रातः उठकर सबसे पहले सूर्यदेव जल, पुष्प, धुप आदि से आराधना करनी चाहिए

इस दिन भगवान जगन्नाथ की भी पूजा करनी चाहिए

पौष माह के शुक्लपक्ष से लेकर पूर्णिमा तक धनुयात्रा निकाली जाती है

भगवान जगन्नाथ को विशेष भोग “मीठाभात” चढ़ाना चाहिए और बाद में सभी भगतों को प्रसाद के रूप में बाँटना चाहिए

धनुयात्रा में नुक्कड़ नाटकों और अन्य कार्यकर्मों की सहायता से प्रदर्शन किया जाता है

धनु संक्रांति का महाभारत काल के सबसे बड़े योधा भीष्म पितामाह के साथ का संबंध

धनु संक्रांति को पौष संक्रांति भी कहा जाता है। दक्षिण भारत में इसे धनुर्मास कहा जाता है। इस दिन  भगवान जगन्नाथ जो की श्री हरि विष्णु जी के अवतार है उनकी पूजा और भगवान सूर्य नारायण की पूजा की जाती है।

महाभारत के युद्ध में पितामह भीष्म भी खरमास में धराशायी हुए थे। उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान था। खरमास की समाप्ति तथा सूर्य के उत्तरायण होने पर उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया। सूर्यदेव एक राशि में एक महीने रहते हैं। सूर्यदेव के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश होने पर शुभ कार्य फिर से प्रारंभ हो जाएंगे। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश मकर संक्रांति को होगा। खरमास में भागवत कथा श्रवण को छोड़ विवाह, अनुष्ठान आदि पवित्र कार्य नहीं होते हैं।

इस काल में सभी शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। इस महीने में शुद्ध सात्विक भोजन करना और पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करने के साथ दान, हवन आदि विशेष फलदायी होता है। शास्त्रों में कहा जाता है कि सूर्य के संक्रमण काल में जो मनुष्य स्नान नहीं करता है वह सात जन्मों तक रोगी, निर्धन तथा दुख भोगता है।

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