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ग्रहण के दौरान मंदिर क्यों बंद कर दिए जाते हैं?

Grahan ke samye mandir kyu band kr diye jaate hai

ग्रहण (Grahan), जिसे दूसरे शब्दों में ‘अंधकार’ भी कहा जाता है, हिंदू कैलेंडर के अनुष्ठानों का पालन करने वाले कई हिंदुओं के लिए यह धार्मिक रूप से बहुत महत्व रखता है। ग्रहण दो प्रकारों का होता है, सौर ग्रहण (सूर्य ग्रहण) और चंद्र ग्रहण और यह तब होता है जब एक खगोलीय वस्तु दूसरी वस्तु के मार्ग में आकर आंशिक रूप से या पूरी तरह से उसकी किरणों के पथ को अस्पष्ट करती है।

यह एक मनमोहक दृश्य होता है और एक दुर्लभ खगोलीय घटना है जो केवल सीमित क्षेत्र से दिखाई देती है। इसी घटना को कई लोग ग्रहण का नाम देते हैं और कुछ लोग इस दृश्य को देखने के लिए आश्चर्यजनक रूप से इसके होने की प्रतीक्षा करते हैं, प्राचीन हिंदू ग्रंथों का सुझाव है कि यह ऐसा कुछ नहीं है जिसका हम सभी को इतनी उत्सुकता से इंतजार करना चाहिए।

surye grahan
image: livehindustan.com

राहु और केतु सूर्य और चंद्रमा के पथों के दो बिंदुओं को दर्शाते हैं क्योंकि वे खगोलीय क्षेत्र के चारों ओर घूमते हैं। इसलिए, राहु और केतु को क्रमशः उत्तर और दक्षिण Lunar nodes कहा जाता है। कभी-कभी जब चंद्रमा इन नोड्स को पास करता है, तो यह पृथ्वी और सूर्य के बीच ग्रहण बनाने के लिए पूरी तरह से कारण बनता है।

तथ्य यह है कि ग्रहण तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा में से कोई एक इन बिंदुओं में से एक पर आ जाता है। हिंदू ज्योतिष (ज्योतिष-शास्त्र) में, राहु और केतु के इस चक्र को बड़ी ही अच्छी तरह से समझा गया है, लेकिन ग्रहण के साथ उनके इस सहयोग के कारण ही राहु और केतु को अज्ञात और अँधेरे का पात्र माना जाता है।

 

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Grahan
image: jansatta.com

ग्रहण के दौरान हिन्दू मंदिर क्यों बंद कर दिए जाते हैं और इस समय मंदिर के अंदर क्या होता है?

असल में, मंदिर केवल भगवान के लिए एक जगह नहीं हैं बल्कि, यह शुद्ध जागरूकता की गहरी शांति का अनुभव करने का माध्यम है। और एक जगह है जहां गहरे विचार के माध्यम से जीवन के गहरे पहलू को ध्यान में रखा जा सकता है। वे आध्यात्मिक उपचार के स्थान हैं, जहां स्थान की ज्यामिति का उपयोग एक यंत्र के रूप में किया जाता है। और जहा कोई सूक्ष्म सकारात्मक ऊर्जा प्रवाह करती है।

वह ऊर्जा गहरी चेतना-संबंधी अनुभव का आयोजन करती है। जो भक्तों को मंदिर के भीतर स्वयं के अंदर दिव्यता का अनुभव करने में सक्षम बनाती है। इसलिए, विभिन्न मंदिर विभिन्न प्रकार की सूक्ष्म ऊर्जा उत्पन्न करते हैं, जो सौर मंडल, ग्रहों आदि से आने वाली ब्रह्मांडीय ऊर्जा से भी सम्बन्ध रखती हैं।

एक मूर्ति, जिसे औपचारिक रूप से और अनुष्ठान करके स्थापित किया गया है, लगातार सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करती है। फिर भी, अधिकांश लोग भीतर की गहरी शांति का अनुभव करने के बजाय मंदिरों में अपनी इच्छा सूची प्रस्तुत करने के लिए जाते हैं।

ग्रहण के दौरान, मूर्ति से निकलने वाली सकरात्मक ऊर्जा (जिसे मूर्ति की आभा भी कहा जाता है) कुछ हद तक भंग हो जाती है। हिंदू ग्रंथों के अनुसार, एक ग्रहण के दौरान सूर्य और चंद्रमा, असामान्य रूप से नकारात्मक ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं। इसलिए, मंदिर के आवास के द्वार इन नकारात्मक उर्जाओ को रोकने और कम करने के लिए बंद कर दिए जाते हैं ताकि इससे भक्तों पर दिव्य ऊर्जा के प्रभाव में कोई बाधा या परेशानी न आ सके।

मंदिर के द्वारों को बंद कर, तुलसी की पत्तियों को भी मूर्तियों पर नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करने के लिए रखा जाता है। तुलसी पत्तियों को विशेष रूप से इस उद्देश्य के लिए चुना जाता है क्योंकि उनके पास हानिकारक विकिरण को अवशोषित करने की क्षमता होती है।

हालांकि, श्रीकालहस्तीश्वरा मंदिर जोकि श्री कालाहस्ती में स्थित है को ग्रहण के दौरान बंद नहीं किया जाता। कारण यह कहा जाता है कि यह मंदिर भारत का एकमात्र मंदिर है जहा राहु और केतु की पूजा और प्रार्थना की जाती है, इस प्रकार, यह मंदिर ग्रहण से प्रभावित नहीं होता है।

srikalahasti temple
image: templesofindia.net

अतीत के बुद्धिमान पुरुष मंदिरों पर ग्रहण के प्रभावों से अवगत थे, इस लिए नतीजतन मंदिर के दरवाजो को मूर्तियों, मंदिरों और भक्तों के मंदिरों की यात्रा पर ग्रहण के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए बंद कर दिए जाते हैं।

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