in

गुरु पूर्णिमा (GURU PURNIMA) – जानिये आखिर क्यों की जाती है इस दिन गुरु की पूजा

GURU PURNIMA PAR KYU KI JAATI HAI GURU KI POOJA

GURU POOJA
Filmetriks

वैसे तो पोराणिक शास्त्रों के अनुसार बच्चो को सबसे पहले सुबह उठ कर अपने माता पिता का आशीर्वाद लेना चाहिये क्योकि माता पिता के आशिर्वाद से दिमाग और मन शांत होता है और मन में नये और विशिष्ट गुणों उत्पन्न होते है । उसके बाद अपने गुरु का आशीर्वाद लेना चाहिये ताकि एक शिष्य अपने जीवन में वो सब अच्छे से सिख सके जो उनके गुरु उनको सिखाते है । गुरु पूर्णिमा (GURU PURNIMA) पर गुरु के आशीर्वाद लेने का विशेष महत्व है ।

आषाढ़ पूर्णिमा में ही क्यों मानते है गुरु पूर्णिमा (GURU PURNIMA)

आषाढ़ मास में आने वाली पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा (GURU PURNIMA) कहते हैं। इस दिन गुरु की पूजा की जाती है । गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इसी वजह से इन दिनों में साधु संत अपने शिष्यों को एक ही स्थान पर रहकर दीक्षा देते थे । इन 4 महीनों में सबसे अधिक वर्षा होती है । ना तो अधिक गर्मी पड़ती है और ना ही अधिक सर्दी इसलिए अध्ययन करने के लिए ये दिन सबसे उपयुक्त माने जाते हैं ।

गुरु तो पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह होते हैं । जो पूर्ण प्रकाशमान होते हैं और शिष्य आषाढ़ के बादलों की तरह होते है । आषाढ़ मास में चंद्रमा बादलों से घिरा रहता है जैसे बादल रूपी शिष्यों से गुरु से घिरे हुए होते है । शिष्य सब तरह के हो सकते हैं । वे अंधेरे बादल की तरह हो सकते है । उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक ला सकते है और गुरु उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी प्रकाश जगा सकता है ।

VYASA PURNIMA

जिस प्रकार सूर्य के ताप से तपती हुई भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है । उसी प्रकार गुरु के चरणों में आ जाने से व्यक्ति को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है । इस दिन महाभारत के रचयिता वेद व्यास जी का जन्म हुआ था । उन्होंने ही चारों वेदों की रचना भी की थी। इसलिए उनका नाम वेदव्यास पड़ा । वेदव्यास जी संस्कृत के बहुत बड़े ज्ञानी थे । उन्हीं के सम्मान में गुरु पूर्णिमा (GURU PURNIMA) को व्यास पूर्णिमा (VYASA PURNIMA) के नाम से भी जाना जाता है ।

यह भी पढ़े: GURU PURNIMA KYU MANATE HAI

गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है क्योंकि गु का अर्थ होता है अंधकार या अज्ञान और रू का अर्थ है निरोधक । अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ही गुरु कहा जाता है । गुरु और देवता एक ही समान होते हैं । जिस प्रकार देवताओं को प्रसन्न करने के लिए भक्ति की आवश्यकता पड़ती है । उसी प्रकार अच्छे गुरू को प्राप्त करने के लिए सद्गुणों की आवश्यकता पड़ती है और एक अच्छे गुरु की कृपा के अभाव में इस संसार में कुछ भी संभव नहीं है ।

इसी वजह से तो गुरु पद सबसे श्रेस्ठ है और इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा का महत्व है । इसमें गुरु की तरफ भी इशारा है और शिष्य की तरफ भी । यह इशारा तो है ही कि दोनों का मिलन जहां हो, वहीं सार्थकता है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

kaal-sarp-dosh

कालसर्प दोष के लक्षण, कारण और उपचार

Gudakesh-Lakshman

लक्ष्मण से जुड़े 10 दिलचस्प तथ्य आप भी जाने