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रंगों का त्योहार होली और इसके लाभ

Holi Rango Ka Tyohaar
होली का त्योहार सम्पूर्ण भारत में बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह फाल्गुन के महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है (जो की कैलेंडर के अनुसार मार्च के महीने में आता है)। होली के पीछे की कहानी तो आप पहले ही जानते होंगे।

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लेकिन इस पोस्ट में हम यहां होली के त्यौहार के पीछे के विज्ञान को जानने की कोशिश करेंगे। चलिए डालते है एक नज़र होली के पीछे के विज्ञान पर।

होलिका दहन के दौरान उत्पन्न गर्मी आपके शरीर में बैक्टीरिया को मार देती है

यह त्योहार है जो सर्दियों के अंत और गर्मियों की शुरुआत के बीच होता है। इस अवधि के दौरान वातावरण में तो बैक्टीरिया बढ़ता ही है साथ ही साथ यह हमारे शरीर में भी बढ़ जाता है। जैसा कि आप पहले से ही जानते हैं होली से एक दिन पहले रात को होलिका दहन किया जाता है, और लोग अग्नि के चारों ओर एक परिक्रमा करते हैं। जब होलिका जलाई जाती है, तो आसपास का तापमान 50/60 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। दहन से निकलने वाली गर्मी शरीर में बैक्टीरिया को मार देती है और शरीर को साफ कर देती है।

अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है

अलाव या होलिका दहन की शेष राख को भारत के कुछ हिस्सों में माथे पर लगाया जाता है। कुछ भागों में लोग इसे चंदन, पत्तियों और आम के पेड़ के फूलों के साथ भी मिलाते हैं। यह अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाला है।

ऋतु परिवर्तन की थकावट से निपटने के लिए

चूंकि इस अवधि के दौरान सर्दी से लेकर गर्मियों तक के मौसम में बदलाव होता है, इसलिए अधिकांश लोग थकान और आलस महसूस करते हैं। तो ढोल, मंजीरा और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ गाने बजाने की संस्कृति सारे शरीर को जोश से भर देती है और मानव शरीर को फिर से मजबूत करने में मदद करता है।

प्राकृतिक रंगों के वैज्ञानिक लाभ भी हैं

होली में इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक रंग शरीर को फिट रखते हैं। यदि रंग की किसी प्रकार की कमी है, तो यह बीमारी का कारण बन सकता है। इसे ठीक करने के लिए, वैद्य और आयुर्वेदिक डॉक्टरों द्वारा रंग तत्व युक्त भोजन या दवा प्रदान की जाती है। जब होली खेलने की संस्कृति शुरू हुई तो लोगों ने हल्दी, नीम, तुलसी, कत्था आदि प्राकृतिक स्रोतों के रंगों का इस्तेमाल किया। इन प्राकृतिक रंगों का मानव शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है और यह शरीर में आयनों को मजबूत करने के साथ अच्छे स्वास्थ्य और सौंदर्य को भी बढ़ावा देता है।

हालांकि, आज लोग सिंथेटिक रंगों का उपयोग कर रहे हैं क्योंकि हर्बल रंग पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं और सिंथेटिक रंग बहुत सस्ते हैं। इस तरह से बने रंग मानव शरीर पर केवल नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। इनमें जहरीले पदार्थ जैसे लेड, ऑक्साइड, क्रोमियम आयोडीन, डीजल, कॉपर सल्फेट शामिल होते हैं और यह त्वचा पर चकत्ते, एलर्जी, आंखों में जलन और रंजकता पैदा करते हैं। यह त्वचा की बीमारियों और बालों सम्बंधित कई बीमारियों को अनजान दे सकता है। इसी लिए इससे अवगत रहें और होली का आनंद लें।

आपके लिए कुछ और रोचक जानकारी। ये प्राकृतिक रंगों के उत्पादन के लिए उपयोग किए जाने वाले पौधे हैं। जिनसे आप आयुर्वेदिक रंगो का निर्माण कर सकते है।

हरा रंग: मेहंदी और गुलमोहर के पेड़ के सूखे पत्ते, जड़ी बूटियों के पत्ते, पालक के पत्ते, बुरांस या बुरुंश के पत्ते।

पीला रंग: हल्दी का पाउडर, बेल फल, अमलतास, गुलदाउदी की प्रजातियाँ और गेंदा, सिंहपर्णी, सूरजमुखी, डैफोडिल्स और डाहलिया, बेसन की प्रजातियाँ।

लाल रंग: गुलाब या सेब के पेड़ की छाल, लाल अनार, टेसू का फूल (पलाश), सुगंधित लाल चंदन, सूखे हिबिस्कस के फूल, मूली और।

केसरी रंग: टेसू के पेड़ (पलाश) के फूल, हल्दी पाउडर के साथ निम्बू मिलाकर बनाया नारंगी पाउडर, बारबेरी(दारूहल्दी)।

नीला रंग: नील, जामुन, अंगूर की प्रजातियां, नीले हिबिस्कस और नीले गुलमोहर के फूल।

बैंगनी रंग: चुकंदर।

भूरा रंग: सूखी चाय की पत्ती, लाल मेपल का पेड़, कत्था।

काला रंग: अंगूर की कुछ प्रजातियाँ, आंवले का फल।

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