in

जया एकादशी कब मनाई जाती है जया एकादशी की व्रत कथा और पूजा विधि क्या है

Jaya Ekadashi Vrat Katha And Pujan Vidhi

माघ के महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जया एकादशी के रूप में मनाते हैं। जो भी व्यक्ति जया एकादशी पर व्रत करता है वह भूत, प्रेत, पिशाच आदि की योनि से हमेशा के लिए छूट जाता है। इस एकादशी के व्रत को पूरी विधि अनुसार करना चाहिए। जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु के ‘श्रीकृष्ण अवतार’ की आराधना की जाती है।

तिथि  दिन  शुभ मुहूर्त 
16 फरवरी 2019 शनिवार 6 बजकर 58 मिनट से 9 बजकर 13 मिनट तक 

jaya ekadashi

जया एकादशी व्रत विधि (Jaya Ekadashi Vrat Vidhi)

जया एकादशी के दिन व्रत का संकल्प लेकर धूप, फल, दीप, पंचामृत आदि से भगवान की पूजा करनी चाहिए। पूजन के बाद भगवान को भोग लगाकर प्रसाद का वितरण सभी में करना चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन करा कर क्षमता अनुसार दान देना चाहिए। अंत में स्वमं भी भोजन ग्रहण कर व्रत खोलना चाहिए। जया एकादशी की पूरी रात को यदि हो सके तो भगवान का भजन- कीर्तन व सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए।

जया एकादशी व्रत का महत्त्व

जया एकादशी का व्रत करने वाले मनुष्य को समस्त वेदों का ज्ञान, यज्ञों तथा अनुष्ठानों का पुण्य मिलता है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के सभी पापों का नाश होता है और व्यक्ति को भोग तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। जया एकादशी व्रत करने से मनुष्य को कभी भी प्रेत योनि में नहीं जाना पड़ता।

krishna

जया एकादशी व्रत कथा

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से माघ शुक्ल एकादशी व्रत के बारे में पूछा और इसका क्या विधान है यह भी बताने को कहा। तब भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजन्! इस एकादशी का नाम ‘जया एकादशी’ है। इसका व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप समाप्त हो जाते है और मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य प्रेत योनी से भी मुक्त हो जाता है। इस व्रत को विधिपूर्वक करना चाहिए।

यह कथा उस समय की है जब देवराज इंद्र स्वर्ग में राज करते थे और अन्य सब देवगण सुखपूर्वक स्वर्ग में रहते थे। एक समय इंद्र अपनी इच्छानुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे और गंधर्व गान कर रहे थे। उन गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उसकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन तथा उसकी स्त्री मालिनी भी उपस्थित थे। साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे।

पुष्पवती गंधर्व कन्या माल्यवान को देखकर उस पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम-बाण चलाने लगी। उसने अपने रूप लावण्य और हावभाव से माल्यवान को वश में कर लिया। हे राजन्! वह पुष्पवती अत्यन्त सुंदर थी। अब वे इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गान करने लगे परंतु परस्पर मोहित हो जाने के कारण उनका चित्त भ्रमित हो गया था।

इनके ठीक प्रकार न गाने तथा स्वर ताल ठीक नहीं होने से इंद्र इनके प्रेम को समझ गया और उन्होंने इसमें अपना अपमान समझ कर उनको शाप दे दिया। इंद्र ने कहा हे मूर्खों ! तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है, इसलिए तुम्हारा धिक्कार है। अब तुम दोनों स्त्री-पुरुष के रूप में मृत्यु लोक में जाकर पिशाच रूप धारण करो और अपने कर्म का फल भोगो।

jaya ekadashi VRAT

इंद्र का ऐसा शाप सुनकर वे अत्यन्त दु:खी हुए और हिमालय पर्वत पर दु:खपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे। उन्हें गंध, रस तथा स्पर्श आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं था। वहाँ उनको महान दु:ख मिल रहे थे। उन्हें एक क्षण के लिए भी निद्रा नहीं आती थी।

उस जगह अत्यन्त शीत था, इससे उनके रोंगटे खड़े रहते और मारे शीत के दाँत बजते रहते। एक दिन पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा कि पिछले जन्म में हमने ऐसे कौन-से पाप किए थे, जिससे हमको यह दु:खदायी पिशाच योनि प्राप्त हुई। इस पिशाच योनि से तो नर्क के दु:ख सहना ही उत्तम है। अत: हमें अब किसी प्रकार का पाप नहीं करना चाहिए। इस प्रकार विचार करते हुए वे अपने दिन व्यतीत कर रहे थे।

दैव्ययोग से तभी माघ मास में शुक्ल पक्ष की जया नामक एकादशी आई। उस दिन उन्होंने कुछ भी भोजन नहीं किया और न कोई पाप कर्म ही किया। केवल फल-फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और सायंकाल के समय महान दु:ख से पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उस समय सूर्य भगवान अस्त हो रहे थे। उस रात को अत्यन्त ठंड थी, इस कारण वे दोनों शीत के मारे अति दुखित होकर मृतक के समान आपस में चिपटे हुए पड़े रहे। उस रात्रि को उनको निद्रा भी नहीं आई।

हे राजन् ! जया एकादशी के उपवास और रात्रि के जागरण से दूसरे दिन प्रभात होते ही उनकी पिशाच योनि छूट गई। अत्यन्त सुंदर गंधर्व और अप्सरा की देह धारण कर सुंदर वस्त्राभूषणों से अलंकृत होकर उन्होंने स्वर्गलोक को प्रस्थान किया। उस समय आकाश में देवता उनकी स्तुति करते हुए पुष्पवर्षा करने लगे। स्वर्गलोक में जाकर इन दोनों ने देवराज इंद्र को प्रणाम किया। इंद्र इनको पहले रूप में देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हुआ और पूछने लगा कि तुमने अपनी पिशाच योनि से किस तरह छुटकारा पाया, सो सब बतालाओ।

माल्यवान बोले कि हे देवेन्द्र ! भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही हमारी पिशाच देह छूटी है। तब इंद्र बोले कि हे माल्यवान! भगवान की कृपा और एकादशी का व्रत करने से न केवल तुम्हारी पिशाच योनि छूट गई, वरन् हम लोगों के भी वंदनीय हो गए क्योंकि विष्णु और शिव के भक्त हम लोगों के वंदनीय हैं, अत: आप धन्य है। अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार करो।

जया एकादशी के व्रत से बुरी से बुरी योनि से मनुष्य मुक्त हो जाता है और व्रत करने वाला  मनुष्य हजारों वर्षों तक स्वर्ग में वास करता हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

hanuman

क्या भगवान शिव ही है हनुमान का अवतार?

parashuram

हिन्दू धर्म के आठ चिरंजीवी