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Jitiya Vrat 2019 – जितिया व्रत किस लिए रखा जाता है और जाने जितिया व्रत की संपूर्ण कथा

जितिया व्रत (Jitiya Vrat) वंश वृद्धि व संतान की लंबी आयु के लिए किया जाता है। इस व्रत में गन्धर्वों के राजा ‘जीमूतवाहन’ की पूजा की जाती है। जितिया व्रत को जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। इस बार जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत दो दिनों का हो गया है। कुछ लोग 22 सितंबर को जितिया व्रत रखेंगे और 23 सितंबर की सुबह खोलेंगे। वहीं कुछ लोग 21 सितंबर को व्रत रखेंगे और 22 सितंबर की दोपहर तीन बजे खोलेंगे।

जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत 22 सितंबर को रखना शुभ माना जा रहा है। रविवार को सायं 5 बजकर 37 मिनट से 7 बजकर 5 मिनट बजे के बीच मीन लग्न में विधि अनुसार अपने आराध्य एवं श्री नारायण भगवान विष्णु की आराधना फलप्रद है, क्योंकि इस सायंकाल में मीन लग्न में गुरु की त्रिकोण स्थिति के साथ सूर्य बुध चंद्रमा की केंद्रीय स्थिति उत्तम भक्ति भाव के लिए श्रेष्ठ योग है।

धर्म ग्रंथों के अनुसार जिस दिन आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में सूर्योदय हो उसी तिथि में जितिया व्रत रखा जाना चाहिए। इस बार रविवार 22 सितंबर को सूर्योदय में अष्टमी तिथि है। इस व्रत के लिए अष्टमी तिथि में सूर्योदय का होना अनिवार्य है।

जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत कथा

कथा इस प्रकार है- गन्धर्वों के एक राजकुमार थे जिनका नाम ‘जीमूतवाहन’ था। वह बहुत उदार और परोपकारी थे। बहुत कम उम्र में उन्हें राजा बना दिया गया था जिसकी वजह से उनका मन राज-पाट में नहीं लगता था। ऐसे में वे राज्य छोड़ अपने पिता की सेवा के लिए वन में चले गये। वहीं उनका मलयवती नाम की एक राजकन्या से विवाह हुआ।

एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन ने वृद्ध महिला को विलाप करते हुए दिखा। उसका दुख देखकर उनसे रहा नहीं गया और उन्होंने वृद्धा की इस अवस्था का कारण पूछा। इस पर वृद्धा ने बताया मैं नागवंश की स्त्री हूं और मेरा एक ही पुत्र है। पक्षीराज गरुड़ के सामने प्रतिदिन खाने के लिए एक नाग सौंपने की प्रतिज्ञा की हुई है, जिसके अनुसार आज मेरे ही पुत्र ‘शंखचूड़’ को भेजने का दिन है। आप बताएं मेरा इकलौता पुत्र बलि पर चढ़ गया तो मैं किसके सहारे अपना जीवन व्यतीत करूंगी।

यह सुनकर जीमूतवाहन का दिल पसीज उठा। उन्होंने कहा कि वे उनके पुत्र के प्राणों की रक्षा करेंगे। जीमूतवाहन ने कहा कि वे उनके पुत्र के स्थान पर स्वमं के प्राण दे देंगे उसी समय पक्षीराज गरुड़ भी पहुंच गए और वे लाल कपड़े में ढके जीमूतवाहन को अपने पंजे में दबोचकर पहाड़ के शिखर पर जाकर बैठ गए।

गरुड़जी यह देखकर आश्चर्य में पड़ गये कि उन्होंने जिन्हें अपने चंगुल में गिरफ्तार किया है उसके आंख में आंसू और मुंह से आह तक नहीं निकल रहा है। ऐसा पहली बार हुआ था। आखिरकार गरुड़जीने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा। पूछने पर जीमूतवाहन ने उस वृद्धा स्त्री से हुई अपनी सारी बातों को बताया। पक्षीराज गरुड़ हैरान हो गए। उन्हें इस बात का विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई किसी की मदद के लिए ऐसी कुर्बानी भी दे सकता है।

गरुड़जी जीमूतवाहन की बहादुरी को देख काफी प्रसन्न हुए और उनको जीवनदान दे दिया। साथ ही उन्होंने भविष्य में नागों की बलि न लेने की भी बात कही। इस प्रकार एक मां के पुत्र की रक्षा हुई। मान्यता है कि तब से ही पुत्र की सुरक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की जाती है।

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