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ज्येष्ठ पूर्णिमा (JYESTHA PURNIMA) 2018 – वट पूर्णिमा व्रत का महत्व

JYESTHA PURNIMA OR VAT PURNIMA

JYESTHA PURNIMA
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ज्येष्ठ  मास (JYESTHA PURNIMA) की पूर्णिमा का बहुत खास महत्व है | यह दिन बहुत ही पवित्र माना जाता है और इस दिन सभी लोगो को गंगा में स्नान करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और दान दक्षिणा देनी चाहिए | इस पूर्णिमा को ज्येष्ठ पूर्णिमा और वट सावित्री पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है | इस दिन महिलाओं को व्रत रखना चाहिए और भगवान विष्णु और भगवान शंकर की पूजा करनी चाहिए | अधिक मास में व्रत करने से बहुत लाभ मिलता है | अधिक मास हर 3 वर्ष में एक बार आता है | इस दिन सावित्री पूजन भी किया जाता है |

भारत के कुछ राज्य गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में वट सावित्री का त्यौहार भी इसी दिन मनाया जाता है | पुराने ग्रंथों में यह भी बताया गया है की वटवृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश भगवान का निवास होता है और उसके मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और अग्रभाग में महादेव निवास करते हैं | इसलिए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है |

वट पूर्णिमा (VAT PURNIMA

ज्येष्ठ  पूर्णिमा (JYESTHA PURNIMA) का महत्व

ज्येष्ठ  पूर्णिमा का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इस दिन से भगवान भोलेनाथ के अमरनाथ यात्रा के लिए जल लेकर आने की शुरुआत श्रद्धालु करते हैं | इसलिए इस पूर्णिमा का महत्व और बढ़ जाता है और यही इसकी खास बात मानी जाती है |

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ज्येष्ठ  पूर्णिमा (JYESTHA PURNIMA) का मुहूर्त:

इस वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा 29 मई मंगलवार को है | परंतु यह सोमवार 28 मई शाम 8:40 मिनट से शुरू हो जाएगी और जो 29 मई को शाम 7 बजकर 49 मिनट तक रहेगी |

वट पूर्णिमा
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ज्येष्ठ पूर्णिमा (JYESHTHA PURNIMA) या वट पूर्णिमा (VAT PURNIMA ) व्रत पूजा विधि

इस दिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर के अपने अखंड सुहाग की कामना करती है | इससे जुड़ी एक लोककथा भी है | जब सावित्री ने वटवृक्ष के नीचे अपने मृत पति को यमराज से जीत लिया था तभी से इस दिन स्त्रियां सुबह स्नान करने के बाद नए वस्त्र पहन कर सोलह सिंगार करती है और अपने पति की लंबी उम्र के लिए भगवान से कामना करती है और शाम को वट वृक्ष की पूजा करने के बाद ही जल ग्रहण करती है | इस पूजन में महिलाएं आटे या गुड़ के फल बनाती है और उनको अपने आंचल में रखकर वट वृक्ष में अर्पित करती है और वृक्ष में एक लोटा जल चढ़ा कर हल्दी, सिंदूर लगाकर फल, फूल, धूप और नैवेद्य से पूजन करती है और कच्चे सूत के धागे को हाथ में लेकर वट वृक्ष की 12 परिक्रमा करती है | हर एक परिक्रमा पर एक चने का दाना वृक्ष में चढ़ाती है | वट वृक्ष के तने पर सूत के धागे को लपेटती जाती है | परिक्रमा पूरी होने पर वहीं पर बैठकर सत्यवान और सावित्री की कथा सुनती है और जब पूजा समाप्त हो जाती है तब महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए भगवान से प्रार्थना करती है और इस तरह से अपना व्रत समाप्त करती है | इस दिन भगवान विष्णु और शिव की पूजा करनी चाहिए इससे हमारे जीवन में सुख शांति की प्राप्ति होती है |

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