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कार्तिक मास में क्या करने से होती है हर कामना पूरी और मिलता है शुभ फल

कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima 2018)

kartik maas

हिन्दू धर्म के पौराणिक और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार कार्तिक मास का विशेष महत्व है। कार्तिक महीने में आनेवाली पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा या  त्रिपुरी पूर्णिमा और गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार वर्ष का आठवां महीना कार्तिक महीना होता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा ‘कार्तिक पूर्णिमा’ कहलाती है।

प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि भगवान श्री हरी ने भगवान ब्रह्मा को, भगवान ब्रह्मा ने नारद जी को और नारद जी ने महाराज पृथु को कार्तिक मास के सर्वगुण संपन्न माहात्म्य के बारे में बताया है। कार्तिक मास में व्रत व तप करने का विशेष महत्व बताया गया है। जो भी व्यक्ति यह करता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और सभी पापों का नाश होता है। कार्तिक मास में कुछ नियम प्रधान माने गए हैं, जिन्हें करने से शुभ फल मिलते हैं और हर मनोकामना पूरी होती है।

दीप दान का नियम –

धर्म शास्त्रों के अनुसार, कार्तिक मास में सबसे प्रमुख काम दीप दान करना बताया गया है। इस महीने में नदी, पोखर, तालाब आदि में दीप दान किया जाता है। इससे पुण्य की प्राप्ति होती है।

तुलसी पूजन का नियम –

इस महीने में तुलसी पूजन करने तथा सेवन करने का विशेष महत्व बताया गया है। वैसे तो हर मास में तुलसी का सेवन व आराधना करना श्रेयस्कर होता है, लेकिन कार्तिक में तुलसी पूजा का महत्व कई गुना माना गया है।

भूमि पर शयन का नियम –

भूमि पर सोना कार्तिक मास का तीसरा प्रमुख काम माना गया है। भूमि पर सोने से मन में सात्विकता का भाव आता है तथा अन्य विकार भी समाप्त हो जाते हैं।

संयम रखने का नियम –

कार्तिक मास का व्रत करने वालों को चाहिए कि वह तपस्वियों के समान व्यवहार करें अर्थात कम बोले, किसी की निंदा या विवाद न करें, मन पर संयम रखें आदि।

ब्रह्मचर्य का पालन करने का नियम –

कार्तिक मास में ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक बताया गया है। इसका पालन नहीं करने पर पति-पत्नी को दोष लगता है और इसके अशुभ फल भी प्राप्त होते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन भी इस श्लोक को पढ़ने से व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त हो जाता है

न कार्तिकसमो मासो न कृतेन समं युगम्।

न वेदसदृशं शास्त्रं न तीर्थं गंगा समम्।।

अर्थात- कार्तिक के समान दूसरा कोई मास नहीं, सत्ययुग के समान कोई युग नही, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगा जी के समान कोई तीर्थ नहीं है।

भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार

भगवान विष्णु के भक्तों के लिए यह दिन इसलिए खास है क्योंकि भगवान विष्णु का पहला अवतार इसी दिन हुआ था। प्रथम अवतार में भगवान विष्णु मत्स्य यानी मछली के रूप में थे। भगवान को यह अवतार वेदों की रक्षा, प्रलय के अंत तक सप्तऋषियों, अनाजों एवं राजा सत्यव्रत की रक्षा के लिए लेना पड़ा था।

भगवान शिव का त्रिपुरारी अवतार

शिव भक्तों के अनुसार इसी दिन भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का संहार कर दिया जिससे वह त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए। इससे देवगण बहुत प्रसन्न हुए और भगवान विष्णु ने शिव जी को त्रिपुरारी नाम दिया जो शिव के अनेक नामों में से एक है। इसलिए इसे ‘त्रिपुरी पूर्णिमा’ भी कहते हैं।

गुरु नानक देव जी का जन्म

इसी तरह सिख धर्म में कार्तिक पूर्णिमा के दिन को प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जाता है। क्योंकि इसी दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरु नानक देव का जन्म हुआ था। इस दिन सिख सम्प्रदाय के अनुयायी सुबह स्नान कर गुरुद्वारों में जाकर गुरुवाणी सुनते हैं और नानक जी के बताए रास्ते पर चलने की सौगंध लेते हैं। इसे गुरु पर्व भी कहा जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा-स्नान, दीप दान, अन्य दानों आदि का विशेष महत्व है। इस दिन क्षीरसागर दान का अनंत महत्व है, क्षीरसागर का दान 24 अंगुल के बर्तन में दूध भरकर उसमें स्वर्ण या रजत की मछली छोड़कर किया जाता है। यह उत्सव दीपावली की भांति दीप जलाकर सायंकाल में मनाया जाता है।

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