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खाटूश्याम बाबा कोन है और किनकी सहायता सबसे पहले करते है और क्यों

KHATUSHYAM BABA KRTE HAI HAARE HUE KI SAHAYTA

खाटूश्याम बाबा इस कलयुग के ऐसे भगवान है जिनकी आस्था दूर दूर तक फैली हुई है। व्यक्ति कोई भी हो छोटा हो या बड़ा, अमीर या गरीब और किसी भी धर्म का हो जो भी खाटूश्याम बाबा की नगरी में पुरे मन से जाता है बाबा सबको दर्शन दे कर उनकी तकलीफों को दूर कर देते है। स्वम भगवान श्री कृष्ण ने खाटूश्याम बाबा को घर घर में पूजे जाने का आशीर्वाद दिया था।

KHATU SHYAM JI

खाटूश्याम बाबा को हारे का सहारा, लखदातार आदि बहुत से नामों ने भी जाना जाने लगा है। खाटूश्याम बाबा की नगरी राजस्थान की राजधानी जयपुर से लगभग 80 कि.मी. की दुरी पर है और यह भी कहा जाता है की सभी जगहों से हरा हुआ व्यक्ति जब उनके दरबार में आ जाता है तो बाबा उसकी निराशा को दूर करके उसके जीवन में खुशियाँ भर देते है। जो भी केवल एक बार अपने पुरे मन से इनके दर्शन करता है कहते है वो हमेशा के लिए इनका हो जाता है।

खाटू श्याम बाबा कोन है

महाभारत काल में भीम के पुत्र घटोत्कच और उनकी पत्नी कामकंकता के सुपुत्र का नाम बर्बरीक थे।  बर्बरीक ने महीसागर संगम (गुजरात ) में देवी कात्यायनी  की घोर तपस्या करके देवी से विजय प्राप्ति का आशीर्वाद माँगा और देवी कात्यायनी ने तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें ऐसी भभूत दी जिसे वो युद्ध के समय यदि बाण में लगाकर किसी भी और छोड़ दे तो वह खड़ी बड़ी से बड़ी सेना भस्म हो जाये।  माँ की कृपा से वे तीनो लोको में सबसे बड़े धनुर्धर बन चुके थे।  इन्हे तीन बाण धारी भी पुकारा जाने लगा।

khatu shyam JI MANDIR

धर्म की जीत के लिए किया अपने शीश का दान

महाभारत के युद्ध के दौरान बर्बरीक कोरवो की तरफ से युद्ध में भाग ले रहे थे और दूसरी तरफ भगवान श्री कृष्ण पांडवों के तरफ थे। किन्तु भगवान श्री कृष्ण जानते थे की बर्बरीक के होते हुए पांडव कभी भी युद्ध नही जीत पाएंगे। बर्बरीक ने अधर्म पर धर्म की विजय के लिए अपने शीश का बलिदान कर दिया। इस महादान के बाद भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक से प्रसन्न होकर उनको वरदान दिया कि जैसे-जैसे कलियुग का अवतरण होगा, तुम मेरे नाम अर्थात श्याम के नाम से पूजे जाओगे। इसीलिए इनको खाटू श्याम के नाम से जाना जाता है।

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अपनी माँ को दिए वचन के अनुसार देते है हारे हुए का साथ

बर्बरीक ने अपनी माँ को वचन दिया था की जो भी व्यक्ति सभी तरफ से हारा हुआ होगा और मेरे पास आएगा तो में उसकी सहायता अवश्य करूंगा। जब महाभारत का युद्ध होने वाला था तो बर्बरीक कोरवो की तरफ से युद्ध लड़ना चाहते थे। क्योकि दूसरी ओर स्वम भगवान श्री कृष्ण पांडवों की ओर थे और कोरवों की हार तय थी। इसलिए बर्बरीक ने कोरवों का साथ देने का निर्णय किया किन्तु युद्ध भूमि में पहुचने से पहले भगवान श्री कृष्ण ने ब्राम्हण का रूप धारण कर उनकी परीक्षा ली और उनसे दान माँगा और दान में उनका शीश माँगा।

KHATU SHYAM BABA

बर्बरीक महादानी भी था। उसने अपना शीश दान में दे दिया किन्तु उसने पूरा युद्ध देखने की इच्छा वयक्त की। तब भगवान श्री कृष्ण ने नव शक्तियों की सहायता से बर्बरीक के शीश को अमृत से सींचा और उनके शीश को एक पर्वत पर रख दिया। जहा से बर्बरीक ने सारा युद्ध अपनी आखों से देखा और युद्ध समाप्त होने के बाद उनके शीश को खाटू नगर में दबाया गया और 300 वर्ष पहले वहां के राजा को जब स्वप्न में आ कर बाबा ने दर्शन दिए तब राजा ने खाटू नगरी में बाबा का एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।

श्याम बाबा का सबसे मुख्य दिन शुक्ल पक्ष एकादशी का मानते है जिसे ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है

एकादशी का दिन श्याम बाबा को क्यों प्रिय है

श्री विष्णु भगवान को मुख्य रूप से एकादशी के दिन पूजते है और उन्ही के स्वरूप भगवान श्री कृष्ण की पूजा भी उसी दिन की जाती है | भगवान खाटू श्याम को भगवान श्री कृष्ण जी के वरदान के कारण ही पूजा जाता है इसलिए इनका भी मुख्य दिवस ग्यारस या एकादशी  ही मानी गयी है

जो भी हारा हुआ व्यक्ति खाटू श्याम बाबा की नगरी आता है। बाबा उसके सब दुःख हर लेते है और सदेव के लिए उसको अपना लेते है।

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