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किन वरदानो के कारण भगवान को लेने पड़े अवतार

KIN VARDANO KE KARAN LIYE BHAGVANO NE AVTAR

वरदान देवी और देवताओं के द्वारा किसी भी मनुष्य की कठिन तपस्या या भक्ति से प्रसन्न होकर दिये जाते है और ये वरदान मनुष्य के जीवन में सुख, समृद्धि और सिद्धियां देने में सक्षम हैं। अजर-अमर और अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति के लिए और स्वर्गलोक प्राप्त करने के लिए या फिर कोई अचूक शक्ति हासिल करने के लिए ऋषि-मुनि, सुर-असुर और देवता आदि सभी ब्रह्मा, विष्णु और महेश की कठोर तप करते थे।

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ब्रह्मा, विष्णु और महेश भगवान वरदान तो देते थे साथ ही वे उस वरदान के सदुपयोग के लिए वरदान की सीमा भी रख देते थे ताकि उस वरदान का दुरुपयोग न किया जा सके और जब भी दुरूपयोग किया जाता था तब वे कोई ऐसी लीला रचते थे कि उनके वरदान पर भी कोई आंच भी नही आती थी और राक्षसी शक्ति का अंत भी हो जाता था।

इन वरदानो को देने के कारण त्रिदेवो को लेने पड़े अवतार

  1. कालयवन का नाश करने के लिए लिया श्रीकृष्ण अवतार (Shri Krishan Avtar)

shri krishan

इक्ष्वाकु वंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुंद को कलियुग के अंत तक सोते रहने का वरदान मिला था और उसको जगाने वाला उसी समय भस्म हो जाएगा। द्वापर युग में कालयवन को भगवान श्रीकृष्ण उसी गुफा में ले गए, जहां मुचुकुंद गहरी नींद में सो रहे थे। कालयवन ने उन्हें कृष्ण समझकर लात मारकर उठा दिया था और उनको मिले वरदान के अनुसार कालयवन उसी जगह पर भस्म हो गया।

  1. हिरण्यकश्यप को मारने के लिए लिया नृसिंह अवतार (Narsingh Avatar)

narasimh avtar

हिरण्यकश्यप कश्यप ऋषि का पुत्र था उसने ब्रह्म देव को प्रसन्न कर उनसे यह वरदान प्राप्त कर लिया कि ‘मेरी मृत्‍यु किसी प्राणी, मनुष्‍य, पशु, देवता, दैत्‍य, नाग, जल, स्थल आदि किसी से न हो। मुझे कोई न दिन में मार सके न रात में, न घर के अंदर मार सके न बाहर। न भूमि पर न आकाश में, न पाताल में न स्वर्ग में।’ इस वरदान को पाकर वह अपने आप को अजर-अमर समझने लग गया और जो भी त्रिदेव की पूजा करता था वह उन्हें भी मार देता था।

हिरण्यकश्यप के कई पुत्र थे। उनमें प्रहलाद भगवान विष्णु का भक्त था। हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मारने की बड़ी कोशिशे की किन्तु सफल नही हुआ। एक बार हिरण्‍यकश्यप ने प्रहलाद को एक खंभे से बांध दिया। फिर भरी सभा में प्रहलाद से पूछा, ‘तू जिसकी पूजा करता है वह कहाँ कहाँ है तू जिसे जगत का स्‍वामी बताता है। कहां है वह तेरा जगदीश्‍वर?’ क्‍या इस खंभे में है जिससे तू बंधा है?’

यह कहकर हिरण्यकश्यप अपने हाथो से उस खंभे को तोड़ देता है। और फिर उस खम्बे में से भगवान विष्णु जी का नृसिंह अवतार निकलता है जिसका सिर सिंह का और धड़ मनुष्‍य का था। भगवान नृसिंह ने अपनी जांघों पर रखकर अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का कलेजा फाड़ डाला। नृसिंह भगवान प्रहलाद का राजतिलक करने के बाद वहां से चले गए।

  1. भस्मासुर को मारने के लिए लिया मोहिनी अवतार (Mohini Avtar)

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भस्मासुर ने भगवान शिव को प्रसन्न करके उनसे वरदान मांगा कि जिसके भी सिर पर वह हाथ रखे वह भस्म हो जाए। भगवान शंकर तो भोले भंडारी भोले नाथ है उन्होंने भस्मासुर को वरदान दे दिया। भस्मासुर ने वरदान मिलते ही भगवान शिवजी के सिर पर हाथ रखने के लिए उनकी ओर दौड़ा। शिवजी भी वहां से भागे और विष्णुजी की शरण में आ गए।

तब विष्णुजी ने मोहिनी नाम की एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण किया और  भस्मासुर को अपनी ओर आकर्षित किया और भस्मासुर ने मोहिनी के साथ विवाह की इच्छा रखी। तब विष्णुजी ने मोहिनी अवतार में भस्मासुर को अपने साथ नृत्य करने का आमंत्रण दिया और कहाँ यदि वह उन्हें नृत्य में हरा देगा तभी वह उनसे विवाह करेगी । भस्मासुर शिव को भूलकर उस सुंदर स्त्री के मोहपाश में बंध गया।

नृत्य करते समय भस्मासुर मोहिनी की ही तरह नृत्य करने लगा और उचित मौका देखकर विष्णुजी ने अपने सिर पर हाथ रखा। शक्ति और काम के नशे में चूर भस्मासुर ने जिसकी नकल की और भस्मासुर अपने ही प्राप्त वरदान से भस्म हो गया।

  1. महिषासुर का अंत करने के लिए लिया दुर्गा का अवतार (Durga Avtar)

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महिषासुर जो एक महाबली दैत्य था उसने ब्रम्ह देव की आराधन करके अमर होने की इच्छा की। ब्रह्माजी उसके तप से प्रसन्न हुए और महिषासुर ने उनसे अमर होने का वर मांगा। ब्रह्माजी ने कहा मृत्यु को छोड़कर, जो कुछ भी चाहे मांग लो, मैं तुम्हें दे दूंगा, क्योंकि जन्मे हुए प्राणी का मरना तय होता है। महिषासुर ने बहुत सोचा और फिर कहा- ‘ठीक है प्रभो। देवता, असुर और मानव किसी से मेरी मृत्यु न हो। किसी स्त्री के हाथ से मेरी मृत्यु निश्चित करने की कृपा करें।’ ब्रह्माजी इस वरदान को देकर अपने लोक चले गए।

वर प्राप्त करने के बाद महिषासुर ने सभी लोको पर अपना अधिकार कर लिया और महिषासुर के हाथों सभी को पराजय का सामना करना पड़ा और देवलोक पर भी महिषासुर का अधिकार हो गया। वह त्रिलोकाधिपति बन गया।

भगवान विष्णु ने सभी देवताओं के साथ मिलकर भगवती महाशक्ति की आराधना की। सभी देवताओं के शरीर से एक दिव्य तेज निकलकर एक परम सुन्दरी स्त्री के रूप में प्रकट हुआ। भगवती दुर्गा हिमालय पर पहुंचीं और महिषासुर और उसके असुरों के साथ उनका भयंकर युद्ध छिड़ गया। एक-एक करके देवी ने सबको मार गिराया और अंत में महिषासुर को भी देवी के साथ युद्ध करना पड़ा। महिषासुर ने देवी को मारने का प्रयास किया लेकिन अंत में भगवती ने अपने चक्र से महिषासुर का मस्तक काट दिया और सभी देवताओं और ऋषि मुनियों को उसके आतंक से मुक्त करवाया।

  1. रावण का अंत करने के लिए लिया श्री राम अवतार (Shri Ram Avtar)

shri ram avtarरावण, कुंभकर्ण और विभीषण ने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या करके उनसे वरदान प्राप्त किये। विभीषण ने 5 हज़ार वर्ष तक अपना मस्तक और हाथ ऊपर रखकर तप किया जिससे भगवान ब्रह्मा प्रसन्न हुए। विभीषण ने भगवान से असीम भक्ति का वर मांग लिया। विभीषण श्रीराम के भक्त बने और आज भी वे अजर-अमर हैं।

कुंभकर्ण ने इंद्र लोक की अभिलाषा के लिए 10 हजार वर्षों तक कठोर तप किया। उसकी तपस्या पूरी हुई किन्तु जब ब्रम्ह देव वरदान देने लगे तब देवी देवी सरस्वती कुंभकर्ण की जिह्वा पर विराजमान हो गईं और कुंभकर्ण ने इंद्रासन की जगह निंद्रासन मांग लिया। उसने हर समय सोते रहने का वरदान मांग लिया और इस वरदान के परिणाम सवरूप कुंभकर्ण अनेको वर्षों तक सोता रह सकता था।

रावण ने अपने भाइयों से भी अधिक कठोर तप किया। रावण को धर्म और पांडित्य का पूरा ज्ञान था और वह सबसे बुद्धिमान भी था। वो प्रत्येक 11वें वर्ष में अपना एक शीश भगवान के चरणों में समर्पित कर देता। इस तरह उसने भी 10 हजार साल में अपने दसों शीश भगवान को समर्पित कर दिए। उसके तप से प्रसन्न होकर उसको उसका मन चाहा फल दे दिया। रावण ने  देव, दानव, दैत्य, राक्षस, गंधर्व, किन्नर, यक्ष आदि सभी दिव्य शक्तियां उसका वध न कर सके ऐसा वरदान माँगा। रावण ने मनुष्य और जानवरों को तुच्छ समझता था इसलिए वरदान में उसने इनको छोड़ दिया। यही कारण था कि भगवान विष्णु को उसके वध करने के लिए मनुष्य अवतार में आना पड़ा और भगवान श्री विष्णु ने राम अवतार धारण कर रावण का अंत कर असत्य पर सत्य की जीत की।

  1. राजा बली के अहंकार को तोड़ने के लिए लिया वामन अवतार (Vaman Avtar)

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राजा बली बड़े ही परतापी और परम दानवीर राजा थे। असुर वंश में जन्म लेने के बाद भी वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे। राजा बली ने अपने बल से इंद्रलोक सहित संपूर्ण पृथ्वी पर आधिपत्य स्थापित कर लिया।

तब देवताओं ने त्रिदेवों से सहायता मांगी तब भगवान विष्णु ने वामन का रूप धारण कर राजा बली से तीन पग भूमि दान में मांगी। दो पग में भगवान ने पृथ्वी व देवलोक को नाप लिया। तीसरा पग के लिए जब कुछ नही बचा तब राजा बली ने अपना सिर आगे कर दिया।

भगवान विष्णु राजा बली की उदारता से प्रसन्न हुए और चिरंजीवी होने का वरदान दिया। भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक का राजा बना कर उनको वहां निवास करने और पाताल लोक की रक्षा करने को कह कर भगवान विष्णु अपने धाम को चले गये।

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