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किस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्यों को मानव जन्म मिलता है

किस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मिलता है मानव जन्म 

मानव जन्म केवल उन्ही व्यक्तियों को मिलता है जिन्होंने पूर्व जन्म में कुछ अच्छे कार्य किये होते है और पूर्व जन्मों में किये गये अन्य पापों को समाप्त करने हेतु भगवान उन सब मनुष्यों को मोका देते है। ताकि वे अपने पापों से मुक्त हो सके और एक पवित्र आत्मा के रूप में उस परमात्मा में लीन हो सके।

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मनुष्यों को जीवन में क्या करना चाहिये और जीवन का लक्ष्य क्या लक्ष्य होना चाहिए ये जानना बहुत जरुरी है। सभी योनियों में केवल मनुष्य योनी ही ऐसी है जिसमे पूर्ण रूप से शुद्ध होकर भगवान की भक्ति आराधना की जा सकती है और अपने द्वारा किये गये पापों की क्षमा मांगी जा सकती है।

किन्तु मनुष्य अपने जीवन का बहुत सा समय व्यर्थ के कामों में लगा कर समाप्त कर देता है जैसे की खाना-पिना, सोना व वंशवृद्धि करना आदि इन सबका ज्ञान तो पशुओं को भी होता है और वे भी यह सब करते है फिट मनुष्यों और पशुओं में क्या अंतर रह जाता है। व्यक्ति को केवल भोगो के पीछे नही भागना चाहिए। उसे इस जीवन रूपी सागर को पुरे जोश और भक्ति के साथ और सबको साथ में लेकर पार करना चाहिए। लेकिन इन सबको को भुलाकर आज का मनुष्य केवल धन के पीछे भाग रहा है और अनेको पापों के साथ अपने विनाश की और बढ़ता जा रहा है।

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मानव जीवन का केवल एक ही लक्ष्य होना चाहिए – प्रभु की प्राप्ति। सत्कर्म करने से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है और आत्मा परमात्मा में लीन हो जाती है। हमें अपने जीवन में भोग विलाश को छोड़ कर परमात्मा का अनुभव एवम अनुसरण करना चाहिए। मनुष्य जन्म में भी जो मनुष्य परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग पर नहीं बढ़ता वह पशु के समान है और वह सदेव किसी न किसी योनी में अपने पापों के कारण भटकता रहेगा और कष्ट भोगता रहेगा।

जो मनुष्य केवल शारीरिक सुख के लिए जीता है। वह पशु के सामान है। आज का मानव केवल इन्द्रियों के सुख के लिये भोग करता है और ऐसे सम्बंध बनाता है जिनसे शारीरिक सुख मिल सके ऐसा मनुष्य पशु से भी नीच है। इंद्रिय सुख तो पशु भी प्राप्त करते है परन्तु मनुष्य यदि चाहे तो वह अपने मन तथा बुद्धि का सदुपयोग कर भक्ति मार्ग में आगे बढ़ सकता है। मानव और पशु में सबसे बड़ा अंतर बुद्धि का होता है। मानव में बुद्धि होती है जिससे वह पाप व पुण्य में अंतर कर सकता है।

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मनुष्यों में पाचन क्षमता सबसे अधिक होती है और केवल मनुष्यों में ही नही अपितु इस संसार में जितने भी शाकाहारी पशु उन सबकी पाचन क्षमता अधिक होती है जबकि मांसाहारी पशुओं में पाचन क्षमता शाकाहारी पशुओं के अनुरूप बहुत कम होती है विज्ञान के अनुसार भी मनुष्य शाकाहारी है और मनुष्यों का शरीर शाकाहारी भोजन के लिए ज्यादा उपयुक्त है। वैदिक धर्मों के अनुसार भी जो मनुष्य मांसाहारी बनता जाता है उसकी बुद्धि भी वैसी ही होती जाती है। परन्तु इस बात को नजरंदाज करते हुए आज विश्व में बहुत लोग मांसाहारी होते जा रहे है।

जीवन का सही अर्थ जानने के लिए जीवन को पूर्ण रूप से जीना चाहिए और जब आप ऐसा करेंगे तभी जीवन का सही अर्थ जानेंगे। मनुष्य हर कदम पर केवल यही सोचता है की उसे हर कदम पर कोई सिखाने वाला होना चाहिए लेकिन जीवन में जितना अधिक आप स्वमं से सिख सकते हो उतना आपको कोई नही सिखा सकता। यदि मनुष्य अपने शरीर के बारे में न सोच कर अपने कर्मों के बारे में सोचेगा तो उसका जीवन सुधर जायेगा। यदि कर्म अच्छे होंगे तो प्रशंसा, आलोचना, व्यंग्य मिलने पर भी आपको अच्छा ही महसूस होगा क्योकि आप जानते होंगे की आप अच्छा कार्य कर रहे है। इन सब बातों को न सोचते हुए आगे बढ़ते रहना ही जीवन का सही अर्थ है और इसी समझ में स्थापित होना जीवन का लक्ष्य है।

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इस मानव जन्म में केवल अपनी इंद्रियों को वश में करने वाला ही देवतुल्य बनता है और जो ऐसा नही कर पाते वे पशुता की ओर बढ़ते जाते है। किन्तु आज किसी को तन का रोग, मन की अशांति, धन की कमी या अन्य कोई न कोई पीड़ा, कुछ न कुछ दुःख लगा ही रहता है और इन्ही वजह से मनुष्य को जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती और न ही सुख और शांति मिलती हैI सभी योनियों में केवल मानव योनी ही भगवान को भी सबसे जयादा प्रिय है इसीलिए भगवान ने भी समय समय पर मनुष्य योनी में जन्म लेकर अपने होने का प्रमाण दिया है।

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मनुष्य अपना मित्र भी है तथा शत्रु भी। देवताओं के पुण्यों की समाप्ति होती है तो वह मनुष्य शरीर में जन्म लेते है और जब मनुष्य पाप करता है तो पशु बनता है। देवता भी अपने आराध्य की भक्ति करने के लिए मानव योनी चाहते है क्योंकि देवयोनि में देव अपने द्वारा संचित पुण्य कर्मो का फल भोगते है और अपने पुण्यों को बढ़ाने के लिए मनुष्य योनी सबसे उपयुक्त होती है और देवताओं को भी संचित पुण्यों का भोग करने के पश्चात मानवयोनि में जन्म लेना होता है। मानव शरीर प्राप्त होने पर भी जो परमात्मा प्राप्ति के लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित नहीं करता वह अभागा है। और स्वयं का ही शत्रु बन जाता है।

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जो भी मनुष्य परमात्मा प्राप्ति के मार्ग पर चलता है उसके जीवन में सदैव आनंद बना रहता है और उस पर सांसारिक दुखो का कोई असर नहीं होता। मानव को अपने जीवन का लक्ष्य कभी नहीं भुलना चाहिये। हमे ये ध्यान रखना चाहिए की जो भी कुछ वर्तमान में चल रहा है केवल वही सत्य है केवल एक ही जन्म मिला है और वह अंतिम भी हो सकता है  इसलिय पुरुषार्थ करते हुए स्वयं को इस ज्ञान रूपी सागर में परमात्मा की भक्ति करते हुए और बिना भटके हुए पार करना ही सर्वोतम लक्ष्य हैI

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मानव जीवन का एक ही लक्ष्य है जन्म उसी परमात्मा से हुआ है और अंत में भी उसी में लीन होना है। इसलिए मनुष्य को अपने जन्म को सफल बनाने के लिए ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे समस्त मानव जाती उसे याद रखे और उसके जीवन से प्रेरणा लेकर दुसरे मनुष्य भी वैसा ही कार्य करेंI

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