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माता सती और उनके 51 शक्तिपीठों की कथा

Mata Sati ke 51 Shaktipeeth

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वनवास के दौरान जब माता सीता का हरण रावण ने किया था और भगवान राम लक्ष्मण के साथ सीता माता की खोज कर रहे थे तब ये सब माता सती और शिवजी कैलाश पर्वत पर बैठे देख रहे थे। तभी सती माता ने शिव जी के सामने प्रश्न रखा के राम तो स्वयं भगवान विष्णु के अवतार है वो फिर भी पत्नी के वियोग में तड़प रहे है वो तो रावण का पता लगा सकते है। तब भगवान शिव ने कहाँ के ये सत्य है के राम भगवान विष्णु का अवतार है लेकिन उन्होंने मनुष्य का जन्म लिया है तो उन्हें भी हर कष्ट से होकर गुजरना होगा।

भगवान शिव ने बोला के साधारण मनुष्य के जन्म के बावजूद भी भगवान राम में वो सभी शक्तियाँ है। लेकिन सती ने ऐसा मानने से इंकार कर दिया और शिव की आज्ञा लेकर राम की परीक्षा लेने के लिए सीता का रूप धारण कर धरती पर चली गयी और उस रास्ते पर जाकर बैठ गई जहा से भगवान राम और लक्ष्मण गुजरने लगे थे। तभी भगवान राम ने हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और बोला के माता आज अकेले वन विहार करने निकले हो भगवान शिव कहा है ? माता लज्जित होकर राम को सफलता का आशीर्वाद देकर वहा से चली आयी।

जब शिव ने सती से पूछा क्या तुमने मेरे राम की परीक्षा ली तो सती ने मना कर दिया। लेकिन भगवान शिव अपनी दिव्य दृष्टि से सब देख चुके थे। देवी सती ने शिव के प्रभु राम की परीक्षा ली इस वजह से शिव ने मन ही मन सती का त्याग कर दिया।

उसी समय दौरान देवी सती के पिता दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन भी किया। जिसमे सभी देवी देवताओ को आमंत्रित किया लेकिन भगवान शिव और देवी सती को नहीं बुलाया। देवी सती उस यज्ञ में जाना चाहती थी तो भगवान शिव की आज्ञा लेकर अपने पिता दक्ष के घर चली गयी। जब देवी सती ने देखा के वहां तो उनके पति का आसन भी नहीं है तो वह अपने पति के अपमान को सहन नहीं कर पायी और चलते यज्ञ के हवन कुंड में कूद गयी।

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जब भोलेनाथ को इस बात का पता चला तो सती के शरीर को गोद में उठा कर ऋषिकेश की धरती से होते हुए हिमालय पर्वत की और चल पड़े। तभी जहाँ जहाँ पर माता के शरीर के अंग गिरे वो माता के पूज्य स्थान हो गए। माता के ५१ शक्तिपीठ बन गए जिनका वर्णन इस प्रकार है:

1 कालीघाट शक्तिपीठ – kaalighat Shaktipeeth:

कोलकाता के शक्तिपीठ में माँ सती के” दाए पैर की कुछ उंगलिया” गिरी थी। माँ की प्रतिमा में जिव्हा सोने की है। इस प्रतिमा में देवी काली भगवान शिव की छाती पर पैर रखे हुए है और उनकी जिव्हा से रक्त की कुछ बुँदे भी टपक रही है।

2 कामगिरी कामाख्या – Kaamgiri Kamkhya Shaktipeeth:

कामाख्या मंदिर असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवहाटी से ८ किलोमीटर दूर कामाख्या में है मान्यता है के यहाँ सती का “योनि भाग” गिरा था सती की पूजा करने से मुक्ति मिलती है और इच्छाएं पूर्ण होती है।

3 तारा तारिणी – Taara Tarini Shaktipeeth:

तारा तारिणी मंदिर को सबसे अधिक सम्मानित और हिन्दू धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थानों में से एक माना जाता है। यहाँ सती का “स्तन” गिरा था। यहाँ माँ तारा और तारिणी की आधी शक्ति के रूप में पूजा की जाती है।

4 विमला शक्तिपीठ – Vimla Shaktipeeth:

ओडिशा राज्य के पूरी शहर के जगन्नाथ मंदिर में मौजूद है। देवी के मंदिर में शरद ऋतू में दुर्गा पूजन मनाया जाता है। यहाँ देवी सती के “पैर” गिरे थे।

5 हिंगलाज शक्तिपीठ – Hinglaaj Shaktipeeth:

पकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के हिंगलाज जिले में स्थित है। इस देवी को हिंगलाज देवी या हिंगुला देवी या नानी का मंदिर भी कहा जाता है। यहाँ पर देवी सती का “सिर” गिरा था।

6 करवीर शक्तिपीठ – Karveer Shaktipeeth:

महाराष्ट्र स्थित करवीर शक्तिपीठ का हिन्दू धर्म में बहुत मान्यता है। यहाँ पर देवी सती के ‘त्रिनेत्र’ गिरे थे । इस शक्तिपीठ में सुबह की ‘काकड़ आरती’ से लेकर मध्यरात्रि तक शय्या आरती तक अखंड रूप से भजन कीर्तन और पाठ चलता है।

7 सुगंधा शक्तिपीठ – Sugandha Shaktipeeth:

बांग्लादेश शक्तिपीठ शिकारपुर गांव में सुगंधा नदी के तट पर स्थित है। इस स्थान पर देवी की ‘नासिका’ अर्थात नाक गिरा था।

8 महामाया शक्तिपीठ – Mahamaya Shaktipeeth:

अमरनाथ की पवित्र गुफा में भगवान शिव के हिम-ज्योतिर्लिंग के दर्शन होते है। वही पर हिम-शक्तिपीठ भी बनता है। एक गणेश पीठ एक पार्वती पीठ बनता है। पार्वतीपीठ को शक्तिपीठ कहा जाता है। यहाँ पर माँ का “कंठ” गिरा था।

9 ज्वालामुखी – Jwalamukhi Shaktipeeth:

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित है। यहाँ देवी सती की “जिव्हा” गिरी थी। देवी की ज्योति रूप में पूजा की जाती है।

10 त्रिपुरमालिनी शक्तिपीठ जालंधर – Tripuramalini (Devi Talaab) Shaktipeeth:

पंजाब के जालंधर शहर में स्थित इस स्थान पर सती का “बायां वक्ष (स्तन)” गिरा था। देवी का वाम स्तन कपडे से ढका रहता है और धातु से बने मुख के दर्शन भक्तो को कराये जाते है।

11 जयदुर्गा शक्तिपीठ – Jaidurga Shaktipeeth:

बिहार में वैज्ञानाथ धाम में वैज्ञानाथ मंदिर के प्रांगण में यह शक्तिपीठ स्थित है। मान्यता है एक यहाँ सती का ‘हृदय’ गिरा था। कुछ लोगो की मान्यता है की शिव ने सती का यही दाहसंस्कार किया था।

12 गुह्येश्वरी शक्तिपीठ – Guhyeshvari Shaktipeeth:

नेपाल के काठमांडू में पशुपति नाथ मंदिर के पास गुह्येश्वरी शक्तिपीठ स्थित है। यहाँ सती के शरीर के दोनों ‘घुटने’ गिरे थे।

13 मनसा दाक्षायणी – Mansa Dakshayani Shaktipeeth:

मनसा शक्तिपीठ तिब्बत में पवित्र नदी मानस सरोवर के पास स्थित है हिन्दू मान्यता के अनुसार यहाँ पर देवी सती का “दायाँ हाथ” गिरा था। देवी सती को दाक्षायणी दुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। यह धरती का सबसे पवित्र और वह धार्मिक स्थान है जहा भक्तो की सभी इच्छाएं पूर्ण होती है।

14 बिराजा ( विरजा) शक्तिपीठ – Virja Shaktipeeth:

भारत के ओडिशा राज्य में स्थित यह शक्तिपीठ हिन्दुओ का एक प्राचीन तीर्थस्थल है। यहाँ देवी सती की “नाभि” गिरी थी। यहाँ देवी दुर्गा की दिव्या मूर्ति विराजमान है। देवी को ‘विरजा’ ‘गिरजा’ के रूप में पूजा जाता है।

15 गंडकी शक्तिपीठ – Gandki Shaktipeeth:

नेपाल में गंडकी नदी के तट पर पोखरा नामक स्थान पर स्थित है मुक्तिनाथ मंदिर। यहाँ देवी सती का “मस्तक” गिरा था।

16 बहुला शक्तिपीठ – Bahula Shaktipeeth:

शिव जब देवी सती के वियोग में तांडव कर रहे थे तब भगवान विष्णु ने पृथ्वी को शिवजी के प्रकोप से बचाने के लिए सुदर्शन चक्र चलाया था। तब माँ सती की “बायीं बाजु” पश्चिमबंगाल के केतुग्राम में गिरी थी। जो भी भगत सच्चे दिल से माँ की अर्चना करता है वो कभी खाली हाथ नहीं जाता।

17 त्रिपुरा सुंदरी शक्तिपीठ – Tripura Sundari Shaktipeeth:

त्रिपुरा सुंदरी को ‘त्रिपुरेश्वरी’ के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर उदयपुर में स्थित है। यहाँ माता का ‘दाया पैर” गिरा था। मंदिर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है जिसकी आकृति कछुए जैसी है इसलिए इसे ‘कूर्मा पीठा’ भी कहा जाता है।

18 वृंदावन (उमा) शक्तिपीठ – Vrindavan (uma) Shaktipeeth:

यहाँ देवी पार्वती की ‘कात्यायिनी’ रूप में पूजा की जाती है। यहाँ देवी सती के “बाल” गिरे थे। अन्य कथाओ के अनुसार कात्यायिनी भगवान विष्णु की माया शक्ति थी जिसने धरती पर नन्द और यशोदा की बेटी के रूप में जन्म लिया था और स्वयं देवकी और वासुदेव के पुत्र कृष्ण के रूप में जन्म लिया।

19 करवीर ‘महालक्ष्मी’ शक्तिपीठ – Karveer Mahalakshmi Shaktipeeth:

यह महाराष्ट्र के राज्य कोल्हापुर में स्थित है। करवीर मंदिर को देवी महालक्ष्मी का स्थान कहा जाता है। इस मंदिर की विशेषता यह है की यह ‘पंचगंगा’ नदी के किनारे पर स्थित है जहाँ पांच नदियों का संगम होता है। इस स्थान पर देवी सती की “तीसरी आंख” गिरी थी।

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20 नैना देवी-Naina Devi:

51 शक्तिपीठो में से एक शक्तिपीठ नैना देवी भी है जो हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित है। इस स्थान पर देवी सती के “नेत्र” गिरे थे। मंदिर के गर्भ गृह में मुख्या तीन मुर्तिया है। दायी तरफ माता काली, मध्य में नैना देवी और बायीं और भगवान गणेश की प्रतिमा है। मंदिर के पास में ही एक गुफा है जिसे नैना देवी गुफा के नाम से जाना जाता है।

21 ललिता देवी शक्तिपीठ (प्रयागराज) – Lalita Devi Pryaagraaj Shaktipeeth:

प्रयागराज सिर्फ गंगा, यमुना, और सरस्वती के संगम का ही नहीं बल्कि शक्ति का भी प्रमुख केंद्र है। यह स्थान संगम तट से लगभग 5 किलोमीटर की दुरी पर है। मान्यता है के तीनो नदियां माँ ललिता के चरण स्पर्श कर के प्रवाहित हो रही है। इस पवित्र स्थान पर माता के “हाथ की उंगलिया” गिरि थी।

22 जयंती देवी मंदिर – Jyanti Devi Shaktipeeth:

जयंती शक्तिपीठ मेघालय के जयंतिया पहाड़ी पर स्थित है। जहा माता का ‘वाम जांघ’ गिरा था।

23 विशालाक्षी शक्तिपीठ वाराणसी – Vishalakshi Shaktipeeth:

विशालाक्षी मंदिर वाराणसी में पवित्र नदी गंगा के किनारे में स्थित है। मान्यता है की देवी सती की “बायीं आंख” यहाँ पर गिरी थी।

24 भद्रकाली कुरुक्षेत्र – Bhadrkaali Shaktipeeth:

यह ऐतिहासिक मंदिर हरियाणा का एकमात्र सिद्ध शक्तिपीठ है जहा माँ भद्रकाली शक्तिरूप में विराजमान है। कुरुक्षेत्र के देवीकूप में सती का “घुटने का निचला भाग” गिरा था। पांडवो ने युद्ध जीतने पर यहाँ घोड़े चढ़ाये थे,तभी से मान्यता पूर्ण होने पर यहाँ श्रद्धालु सोने, चांदी, व् मिट्टी के घोड़े चढ़ाते है।

25 मणिबंध ‘गायत्री’ शक्तिपीठ अजमेर – Manibandh Gaytri Shaktipeeth:

स्थान जहाँ देवी सती की “मणिवेदिका (कलाई)” गिरी थी। यह स्थान गायत्री पर्वत पर स्थित है इसीलिए इसे गायत्री मंदिर भी कहा जाता है। इस मंदिर में माता सरस्वती और भगवान विष्णु की मूर्ति रूप की पूजा की जाती है।

26 चिंतपूर्णी शक्तिपीठ – Chintpurni Shktipeeth:

सती के 51 शक्तिपीठो में से एक है माता चिंतपूर्णी जो हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित है। मान्यता है के माता के दर्शंन मात्र से ही व्यक्ति चिंताओं से मुक्त हो जाता है। चिंतपूर्णी में माता के “चरण” गिरे थे इसलिए इन्हे “छिन्मस्तिका” देवी भी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंधो के अनुसार सभी मंदिर शिव और शक्ति से जुड़े हुए है। माता के मंदिर के चारो और शिव जी के मंदिर है।

27 पंचसागर वाराणसी – Panchsaagar Shaktipeeth:

पंचसागर शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के वाराणसी के पास स्थित है जहा पर देवी सती के “निचले दन्त” गिरे थे।

28 भवानी देवी चटटे शक्तिपीठ – Bhvani Devi Chatet Shaktipeeth:

बांग्लादेश में चटगाँव जिले के सीताकुंड स्टेशन के पास चन्द्रनाथ पर्वत शिखर पर माता की “दायी भुजा’ गिरी थी। यह शक्तिपीठ देवी भवानी और भगवान चंद्र शेखर (भगवान विष्णु का स्वरुप) को समर्पित है।

29 कन्याश्रम शक्तिपीठ – Kanyasharm Shaktipeeth:

कन्याश्रम शक्तिपीठ तमिलनाडु के कन्याकुमारी में स्थित है। यहाँ पर माता की ‘कमर/रीड की हड्डी “गिरी थी। देवी सती को ‘शर्वाणि’ और भगवान शिव को ‘निमिष’ रूप में पूजा जाता है।

30 हरसिद्धि शक्तिपीठ उज्जैन – Harsidhhi Shaktipeeth Ujjain:

मध्यप्रदेश के उज्जैन का प्रसिद्ध शक्तिपीठ हरसिद्धि माता मंदिर महाकाल ज्योतिर्लिंग मंदिर के पास स्थित है। कहा जाता है सती माता का “बायां हाथ” यहाँ गिरा था। इसी जहां पर महान कवी कालिदास ने माँ की प्रशंसा में काव्य रचना की थी।

31 युगाघा भूतधात्री शक्तिपीठ – Ugadha Bhootdhatri Shaktipeeth:

पश्चिम बंगाल के दक्षिण पश्चिम में “क्षीरग्राम” में स्थित है। यहाँ माता सती के “दाए चरण का अंगूठा” गिरा था। यहाँ माता सती को :भूतधात्री” और भगवान शिव को “युगाघ” कहा जाता है।

32 विमला शक्तिपीठ – Vimla Shaktipeeth:

पूरी में जगन्नाथ जी की प्रांगण में विमला शक्तिपीठ स्थित है। मान्यताओं के अनुसार यहाँ पर देवी सती की “नाभि” गिरी थी। माँ सती को ” विमला” और भगवान शिव को “जगत” कहा जाता है। माँ को देवी काली और देवी दुर्गा के रूप में भी पूजा जाता है।

33 नर्मदा देवी शोन्देश शक्तिपीठ – Narmda Devi Shondesh Shaktipeeth:

मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में अमरकंटक स्थान पर स्थित है। देवी सती को “नर्मदा” और भगवान शिव को “भद्रसेन” रूप में पूजा जाता है। संस्कृत में अमरकंटक का अर्थ होता है ‘अमर’ इसीलिए कहा जाता है की इस स्थान पर जिसकी भी मृत्यु होती है उन्हें स्वर्ग प्राप्त होता है। यहाँ पर माता का “दाया पृष्ठ भाग” गिरा था।

34 कालमाधव शक्तिपीठ – Kaalmadhav Shaktipeeth:

कालमाधव मंदिर मध्यप्रदेश के अमरकंटक स्थान पर स्थित है। यहाँ पर माता का “बाया पृष्ठ” भाग गिरा था। देवी सती को “कालमाधव” और भगवान शिव को “असितानंदा” रूप में पूजा जाता है।

35 रामगिरि-शिवानी शक्तिपीठ – Raamgiri Shivaani Shaktipeeth:

रामगिरि शक्तिपीठ वह स्थान है जहाँ पर माता सती का “दायाँ स्तन” गिरा था जोकि उत्तरप्रदेश के चित्रकूट में स्थित है। यह मंदिर “मैहर देवी” के नाम से सुप्रसिद्ध है।

36 कांची- देवगर्भा – Kaanchi Devbharga Shaktipeeth:

तमिलनाडु के कांचीपुरम में माता की “अस्थि” गिरी थी।

37 शुचि-नारायणी – Shuchi Narayani:

तमिलनाडु के कन्याकुमारी-तिरुवंतपुरम मार्ग पर शुचितीर्थम शिव मंदिर है, जहां पर माता के “ऊपरी दन्त” गिरे थे।

38 भवानीपुर माँ अपर्णा शक्तिपीठ – Maa Arpana Shaktipeeth Bhvaanipur:

बांग्लादेश में बोगरा स्थान पर स्थित देवी दुर्गा का यह शक्तिपीठ बहुत पूजनीय है। मान्यता है के यहाँ माँ शक्ति के “बाएं पैर की पायल’ गिरी थी। भवानीपुर में शक्ति की “अपर्णा” और कालभैरव की “वामन” के रूप में उपासना की जाती है।

39 श्री पर्वत शक्तिपीठ – Shri parvat Shaktipeeth:

श्री पर्वत शक्तिपीठ भारत के राज्य, जम्मू कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर के मूल स्थान को लेकर मतभेद है। देवी सती के “दाएं पैर की पायल” इसी स्थान पर गिरी थी। इस मंदिर में शक्ति को “देवी सुंदरी” और भैरव को “सुंदरानंद” के रूप में पूजा जाता है।

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40 विभाष माँ कपालिनी शक्ति पीठ – Vibaksh Maa Kpalini Shaktipeeth:

पश्चिम बंगाल राज्य के मिदानपुर के ताम्रलुक ग्राम के रूपनारायण नदी के तट पर विभाष शक्तिपीठ है। इस थान पर देवी सती की “बाएं एड़ी” गिरी थी। यहाँ माता को “कपालिनी” “भीमरूपा” तथा भैरव को “सर्वानंद” रूप में पूजा जाता है।

41 श्री चंद्रभागा शक्तिपीठ – Shri Chandrabhaga Shaktipeeth:

गुजरात के प्रभास क्षेत्र में त्रिवेणी संगम के निकट श्री चंद्रभागा शक्तिपीठ स्थित है। माँ सती का “उदर/अमाशय/पेट” यहाँ गिरा था। देवी के इस रूप की रक्षा करने के लिए वक्रतुण्ड भैरव हमेशा देवी के निकट विराजमान है।

42 अवंती शक्तिपीठ- भैरवपर्वत – Avanti Shaktipeeth Bhairavparvat:

मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर में शिप्रा नदी के तट के समीप भैरव पर्वत पर देवी सती की “होठ” गिरे थे।

43 भ्रामरी शक्तिपीठ – Bhramari Shaktipeeth:

भारत में महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले की गोदावरी नदी के तट पर स्थित भ्रामरी शक्तिपीठ में देवी सती की “ठोड़ी” गिरी थी। देवी को “भ्रामरी” और भैरव को “वक्रकाटाक्ष” के रूप में पूजा जाता है।

44 श्री शैल शक्तिपीठ – Shri shail Shaktipeeth:

आंध्रप्रदेश में कुर्नूल के निकट श्री शैल शक्तिपीठ उपस्थित है। इस स्थान पर देवी की “ग्रीवा” या गाला गिरा था। देवी सती को “महालक्ष्मी” और शिव को “ईश्वरानन्द” के रूप में पूजा जाता है।

45 रत्नावली शक्तिपीठ – Ratnavali Shaktipeeth:

भारत के राज्य पश्चिम बंगाल के जिला हुगली में खानकुल, कृष्ण नगर में शिव मंदिर घंटेश्वर के निकट स्थित है। यहाँ माता का “दायाँ कन्धा” गिरा था। इस मंदिर में सती को “शक्ति” और शिव को “भैरव” के रूप में पूजा जाता है।

46 उमा महादेवी शक्तिपीठ-मिथिला – Uma Mahadev Shaktipeeth:

भारत-नेपाल सीमा पर जनकपुर रेलवे स्टेशन के पास मिथिला में माता का “बायां कन्धा” गिरा था।

47 तारा काली शक्तिपीठ – Tara Kaali Shaktipeeth:

तारापीठ भारत में पश्चिम बंगाल प्रान्त के वीरभुरी जिले में एक छोटा सा शहर है। बंगाल क्षेत्र की प्रमुख देवी तारा की पूजा का प्रमुखं केंद्र होने के कारण ही इसका नाम तारापीठ पड़ा।यहाँ पर देवी सती का “नेत्रांश” गिरने का उल्लेख है। पुराणों के अनुसार जब भगवान् शिव ने विषपान किया था तब समस्त देवी-देवताओं के कहने पर माँ तारा ने शिवजी को स्तनपान करा के अमृत पिलाया था।

48 यशोर या यशोरेश्वरी देवी शक्तिपीठ – Yashor Yashoreshvari Shaktipeeth:

यह शक्तिपीठ बांग्लादेश में खुलाना जिले के जैसोर नगर में स्थित है। यहाँ सती के “वाम” (बायीं हथेली) गिरी थी। देवी को “यशोरेश्वरी” तथा शिव को “चंद्र” रूप में पूजा जाता है।

49 नंदनी शक्तिपीठ-नन्दीपुर – Nandani Shaktipeeth Nandinipur:

भारत के राज्य पश्चिन बंगाल के सैन्थया में स्थित है। यह शक्तिपीठ एक वटवृक्ष के नीचे स्थित है। यहाँ देवी एक कछुए के अकार की चट्टान के रूप में विराजमान है। देवी सती का “कंठहार” इस स्थान पर गिरा था।

50 इन्द्राक्षी शक्तिपीठ – Indrakshi Shaktipeeth:

श्रीलंका के जाफना के नल्लूर में स्थित है। देवराज इंद्र ने यहाँ आदिशक्ति काली की पूजा की थी। रावण ने और भगवान् राम ने भी यहाँ देवी की पूजा की थी। यहाँ देवी सती की “दायीं पायल” गिरी थी। देवी को “इन्द्राक्षी” और भैरव को “राक्षसेश्वर” के रूप में पूजा जाता है।

51 अट्टहास/फ़ुल्लारा शक्तिपीठ – Atthas Phullara Shaktipeeth:

पश्चिम बंगाल के “लाबपुर” स्थान पर स्थित है। अट्टहास शक्तिपीठ को “फुल्लारा” देवी के नाम से भी जाना जाता है। अट्ट शब्द संस्कृत से लिया गया है जिसका मतलब है “अत्यधिक हंसी”। इसी लिए देवी को “फुलारा” रूप में और भैरव को “विशेश्वर” रूप में पूजा जाता है। इस स्थान पर देवी सती की “ऊपरी होठ” गिरे थे।a

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