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नृसिंह चतुर्दशी व्रत कथा एवं पूजा विधि

Narsingh Chaturdashi Vrat & Pooja Vidhi

हिन्दू धर्म ग्रंथो के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था।  इसलिए इस तिथि को नृसिंह चतुर्दशी के नाम से जानते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखा जाता है और उनसे जीवन में होने वाली कठिनाइयों से लड़ने के लिए आशीर्वाद माँगा जाता है।

narasimha avtaar

नृसिंह चतुर्दशी व्रत व पूजा विधि

प्रत्येक व्रत की तरह इस व्रत में भी सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत की शुरुआत करनी चाहिए। दोपहर के समय में किसी पवित्र स्थान पर या घर पर ही वैदिक मंत्रों के साथ मिट्टी, गोबर, आंवले का फल और तिल आदि को पूजा के स्थान पर रखना चाहिए और पूजा स्थल को गाय के गोबर से लीप कर उस पर अष्ट दल (आठ पंखुड़ियों वाला) कमल बनाकर पंचरत्न सहित तांबे का कलश को उस पर स्थापित करें।

कलश के ऊपर चावलों से भरा हुआ बर्तन रखें और बर्तन में अपनी इच्छा के अनुसार सोने की लक्ष्मी सहित भगवान नृसिंह की प्रतिमा रखें। इसके बाद दोनों मूर्तियों को पंचामृत से स्नान करवाएं। ब्राह्मण आदि को बुलाकर उनके हाथों द्वारा विधिपूर्वक भगवान नृसिंह का पूजन करवाएं। भगवान नृसिंह को चंदन, कपूर, रोली व तुलसीदल भेंट करें तथा धूपदीप दिखाएं और अंत में आरती करते हुए भगवान विष्णु से अपने सुखी जीवन की कामना करनी चाहिए

जो भी व्यक्ति पुरे धर्म कर्म से शुद्ध होकर नृसिंह चतुर्दशी का व्रत करता है और भगवान नृसिंह की पूजा करता है, उसके मन की हर कामना पूरी हो जाती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

नृसिंह अवतार

दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान से भी अधिक बलवान मानता था। उसे न तो मनुष्य, न देवता, न पक्षी, न पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से मरने का वरदान प्राप्त था। उसके राज्य में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था, उसको दंड दिया जाता था। उसके पुत्र का नाम प्रह्लाद था।

prahlad

प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात जब हिरण्यकशिपु को पता चली तो पहले उसने प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकशिपु ने उसे मृत्युदंड दे दिया। लेकिन हर बार भगवान विष्णु के चमत्कार से वह बच गया। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रह्लाद को लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई।

तब भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था, तब भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का वध अपने जंघाओं पर रख कर किया था क्योकि वरदान के अनुसार हिरण्यकशिपु को न तो मनुष्य, न देवता, न पक्षी, न पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से आदि से कोई भी नही मार सकता था। अत: भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर अपने भक्त की रक्षा करते हुए उसका अंत किया।

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