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नवदुर्गा (Navdurga) की पूजा विधि और मंत्र

Navdurga Ki Pooja Vidhi Aur Mantra 2019

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नवरात्री में कैसे करे देवी के नौ रूपों की पूजा विधि और मंत्र:

नवरात्री एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है “नौ राते”। इन नौ रातो और दस दिनों के दौरान देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है।

नवरात्री( Navdurga) वर्ष में चार बार आती है: पौष, चैत्र, आषाढ़, अश्विन। इन नौ रातो में देवी दुर्गा के तीन स्वरूपों की पूजा की जाती है: महासरस्वती, महागौरी और महाकाली। माता के नौ स्वरूपों को नवदुर्गा कहते है जिसका अर्थ है “जीवन के दुखो को हटाने वाली”।

सर्वप्रथम श्री रामचंद्र जी ने समुद्र तट पर नवरात्रि की पूजा की थी उसके बाद दसवे दिन लंका पर विजयी प्राप्ति करने के लिए प्रस्थान किया था। तब से अधर्म पर धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा।

नौ देवियां है:-

शैलपुत्री: पहाड़ो की पुत्री।
ब्रह्मचारिणी: ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाली।
चंद्रघंटा: चाँद की तरह चमकने वाली।
कुष्माण्डा: पूरा जगत उनके पैर में।
स्कंदमाता: कार्तिक स्वामी की माता।
कात्यायनी: कात्यायन आश्रम में जन्मी।
कालरात्रि: काल का नाश करने वाली।
महागौरी: सफेद रंग वाली माँ।
सिद्धिदात्री: सर्व सिद्धि देने वाली।

1। प्रथम- माता शैलपुत्री:

पर्वतराज हिमालय के घर पितृ रूप में जन्म होने के कारन इनका नाम “शैलपुत्री” पड़ा।

पूजा विधि:


मां शैलपुत्री की तस्वीर स्थापित करें और उसके नीचें लकडी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछायें। इसके ऊपर केसर से शं लिखे। तत्पश्चात् हाथ में लाल पुष्प लेकर शैलपुत्री देवी का ध्यान करें।
मंत्र:

मां शैलपुत्री का निर्भय आरोग्य मंत्र:


विशोका दुष्टदमनी शमनी दुरितापदाम्।
उमा गौरी सती चण्डी कालिका सा च पार्वती।।

ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे।
ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:।

मंत्र के साथ ही हाथ के पुष्प मां के तस्वीर के ऊपर छोड दें। इसके बाद भोग प्रसाद अर्पित करें तथा मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करें। यह जप कम से कम 108 होना चाहिए।

इस मंत्र का जाप करने से भय से मुक्ति मिलती है। आरोग्य जीवन मिलता है। व्यक्ति चुनौतियों से घबराता नहीं बल्कि उनका डट कर सामना करता है।


2। द्वितीय- माता ब्रहम्चारिणी:


ब्रहम्चारिणी माँ दुर्गा का दूसरा स्वरुप है। ब्रह्म का अर्थ है “तपस्या” और चारिणी का अर्थ है “आचरण करने वाली”। देवी ब्रह्मचारिणी माँ पार्वती के जीवन काल का वो समय था जब उन्होंने भगवान् शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी।

देवी की उपासना करने से मनुष्य को सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है और सभी परेशानियों और समस्या का विनाश होता है।

पूजा विधि:

देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा में सर्वप्रथम माता की फूल, अक्षत, रोली, चंदन, से पूजा करें तथा उन्हें दूध, दही, शक़्कर, घी व मधु से स्नान करायें व देवी को प्रसाद अर्पित करें।

प्रसाद के पश्चात आचमन और फिर पान, सुपारी भेंट कर इनकी उपासना करे । कलश देवता की पूजा के पश्चात इसी प्रकार नवग्रह, नगर देवता, ग्राम देवता, की पूजा करें।
देवी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर प्रार्थना करें-

इसके पश्चात् देवी को पंचामृत स्नान करायें और फिर भांति भांति से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें देवी को कमल बेहद प्रिय होते हैं अत: इन फूलों की माला पहनायें, घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें।


ब्रह्मचारिणी का परीक्षा में सफलता दिलाने का मंत्र:


विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः।।

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3। तृतीय – माता चंद्रघंटा:

चंद्रघंटा देवी दुर्गा का तीसरा रूप है। उसका नाम चन्द्र-घण्टा है, जिसका अर्थ है “जिसके पास घंटी की तरह अर्धचंद्र है। माँ का यह स्वरुप अति परमशक्तिदायी और तेजपूर्ण है। माँ के मस्तक पर घंटे के आकर में अर्धचंद्र सुशोभित है इसलिए देवी के इस स्वरुप को चंद्रघंटा कहाँ जाता है।

उसकी तीसरी आंख हमेशा खुली रहती है और वह हमेशा राक्षसों के खिलाफ युद्ध के लिए तैयार रहती है”। वह चंद्रखंड, चंडिका या रणचंडी के रूप में भी जानी जाती है।

वह अपनी कृपा, बहादुरी और साहस के साथ लोगों को पुरस्कृत करने के लिए माना जाता है। उनकी कृपा से भक्तों के सभी पाप, संकट, शारीरिक कष्ट, मानसिक कष्ट और भूत-प्रेत बाधाएं मिट जाती हैं।

पूजा विधि:


माता की चौकी पर माता चंद्रघंटा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें। चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टीके घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें।

इसके बाद पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां चंद्रघंटा सहित समस्त स्थापित देवताओं की पूजा करें। तत्पश्चात प्रसाद वितरण कर पूजन संपन्न करें।

माँ चंद्रघंटा के भोग में गाय के दूध से बने व्यंजनों का प्रयोग किया जाता है। माँ को लाल सेब और गुड का भोग लगाया जाता है।

मां चंद्रघंटा का संकटनाशक मंत्र:


हिनस्ति दैत्य तेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योsनः सुतानिव।।
मां चंद्रघंटा को मखाने की खीर का भोग लगायें।

4। चतुर्थी– माता कूष्मांडा:


कुष्मांडा की पूजा नवरात्रि के त्योहार के चौथे दिन की जाती है और माना जाता है कि यह स्वास्थ्य में सुधार करती है और धन और शक्ति को बढ़ाती है।

देवी कूष्मांडा के आठ हाथ हैं और इसी वजह से उन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। जिनमें कमंडल, धनुष-बाण, कमल पुष्प, शंख, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है।

मां के पास इन सभी चीजों के अलावा हाथ में अमृत कलश भी है। इनका वाहन सिंह है और इनकी भक्ति से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है। यह माना जाता है कि सिद्धियों और निधियों को श्रेष्ठ बनाने की सारी शक्ति उनकी जाप माला में स्थित है।

एक हिंदू देवी हैं, जिन्हें उनकी दिव्य मुस्कान के साथ दुनिया बनाने का श्रेय दिया जाता है। इनके नाम में ही इनकी मुख्या भूमिका छिपी हुए है: कू का अर्थ है “थोड़ा”, उषमा का अर्थ है “गर्माहट” या “ऊर्जा” और अंद का अर्थ है “ब्रह्मांडीय अंडा”।

ऐसा कहा जाता है कि उसने पूरे ब्रह्मांड की रचना की, ब्रह्मानंद और कुष्मांडा के साथ संबंध के कारण वह देवी कुष्मांडा के नाम से प्रसिद्ध हैं।

पूजा विधि:

माता कुष्मांडा के दिव्य रूप को मालपुए का भोग लगाकर किसी भी दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को इसका प्रसाद देना चाहिए।

इससे माता की कृपा स्वरूप उनके भक्तों को ज्ञान की प्राप्ति होती है, बुद्धि और कौशल का विकास होता है। देवी को लाल वस्त्र, लाल पुष्प, लाल चूड़ी भी अर्पित करना चाहिए।

देवी योग-ध्यान की देवी भी हैं। देवी का यह स्वरूप अन्नपूर्णा का भी है। उदराग्नि को शांत करती हैं। इसलिए, देवी का मानसिक जाप करें। देवी कवच को पांच पढ़ना चाहिए।

मां कूष्माण्डा का संतान सुख मंत्र:


स्तुता सुरैः पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।।
मां कूष्माण्डा को अनार के रस का भोग लगायें।

5। पंचम- माता स्कंदमाता:


देवी पार्वती भगवान स्कंद (जिन्हें भगवान कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है) की माता बनी, तो माता पार्वती को देवी स्कंदमाता के नाम से जाना गया।

देवी स्कंदमाता का रंग शुभ्रा (शुद्र) है जो उनके श्वेत रंग का वर्णन करता है। देवी पार्वती के इस रूप की पूजा करने वाले भक्तों को भगवान कार्तिकेय की पूजा करने का लाभ मिलता है। यह गुण केवल देवी पार्वती के स्कंदमाता रूप के पास है।

पूजा विधि:

स्कंदमाता की पूजा मंत्रों का जाप और उनके केले चढ़ाए बिना पूरी नहीं होती है। उसे फल अर्पित करने के बाद प्रसाद किसी ब्राह्मण को देना चाहिए। चूंकि देवी बुध ग्रह पर शासन करती हैं, इसलिए यह पूजा आपकी बुद्धिमता को बढ़ाने में मदद करती है।

आप पूजनस्थान को फूलों से सजाएं और देवी को जल, चावल, मिठाई और फल अर्पित करें। माथे पर चंदन का तिलक लगाना न भूलें। विवाहित महिलाएं अपने पति के साथ अपने रिश्ते को हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए चंदन या रोली की बजाय सिंदूर (सिंदूर) लगाती हैं। देवी स्कंदमाता के पसंदीदा फूल लाल रंग के फूल है, इसीलिए देवी को लाल रंग के गुलाब भेंट किये जाते है।

स्कंदमाता का बुद्धि विकास मंत्र:


सौम्या सौम्यतराशेष सौम्येभ्यस्त्वति सुन्दरी।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी।।
स्कंदमाता को हलवे का भोग लगायें।

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6। षष्ठी – देवी कात्यायनी:


देवी पार्वती के नौ रूपों में से, कात्यायिनी को नवरात्रि के छठे दिन पूजा जाता है। पुराणों के अनुसार, देवी पार्वती ने राक्षस महिषासुर का विनाश करने के लिए कात्यायनी का रूप धारण किया था।

कात्यायनी देवी पार्वती का प्रिय पहलू है, जैसा कि वह एक योद्धा देवी के रूप में दिखाई देती हैं। शक्तिवाद में शक्ति, दुर्गा, भद्रकाली और चंडिका जैसे संदर्भ भी उनके लिए समर्पित हैं।

वामन पुराण में, यह उल्लेख है कि जब राक्षस महिषासुर ने तीनों लोकों में कहर मचाया, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित सभी देवताओं ने अपनी ऊर्जाओं को मिला दिया।

कात्यायन ऋषि के धर्मोपदेश में किरणों के रूप में इन ऊर्जाओं का मिश्रण किया गया जो ध्यान और शास्त्रों के अध्ययन के लिए समर्पित थीं। उन्होंने प्रकाश का ध्यान किया और देवी कात्यायनी अपने तपस्या से निकलीं। तो कात्यायनी का अर्थ है कात्यायन ऋषि की पुत्री।

पूजा विधि:

यह दिन कुवारी कन्याओं के लिए बेहद खास है, क्योंकि मां कात्यानी के प्रसन्न कर मनचाहा वर प्राप्त कर सकते हैं। आज हम मां कात्यायनी को खुश करने की खास पूजा विधि और उनका खास मंत्र बताने जा रहे हैं।

मां कात्यायनी की पूजा करने से विवाह का योग भी बनता हैं।मां कात्यायनी सिंह की सवारी करती हैं और इनकी चार भुजाएं होती हैं।

इन 4 भुजाओं में से एक भुजा में माता तलवार पकड़े और एक हाथ में कमल का फूल थामें नजर आती हैं। बाकी के दोनों हाथ से माता अपने भक्तों का आशीर्वाद देती हैं।

नवरात्र के छठे दिन सुबह तड़के उठे और नहाने के बाद सबसे पहले मां कात्यायनी का ध्यान करें और ज्योत जलाएं। इसके बाद नवरात्र कलश का और सभी देवी-देवताओं की भी पूजा करें।

मां कात्यायनी की पूजा करते समय उन्हें शहद का भोग जरूर लगाएं। माता को भोग लगाने के बाद ‘ऊं देवी मां कात्यायन्यै नम:’ मंत्र का जाप करते हुए कात्यायनी देवी पर फूल अर्पित करें।

ध्यान रहे कि माता कत्यायनी की पूजा करने के बाद ब्रह्मा और विष्णु जी की भी पूजा करना न भूलें। मां कत्यायनी की पूजा करते समय इन मंत्रों को जरूर पढ़ें। इन मंत्रों का जाप करने से माता प्रसन्न होती हैं और आपकी सभी मनोकामना पूरी होगी।

मां कात्यायनी का दाम्पत्य दीर्घसुख प्राप्ति मंत्र:

एतत्ते वदनं सौम्यम् लोचनत्रय भूषितम्।
पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायिनी नमोsस्तुते।।
माता को नारियल के लड्डू का भोग लगायें।

7। सप्तम– माता कालरात्रि:

जब देवी पार्वती ने शुंभ और निशुंभ नाम के राक्षसों को मारने के लिए बाहरी सुनहरी त्वचा को हटाया, तो उन्हें देवी कालरात्रि के नाम से जाना गया। कालरात्रि देवी पार्वती का उग्र रूप है।

यद्यपि देवी कालरात्रि देवी पार्वती का सबसे क्रूर रूप हैं, वह अपने भक्तों को अभय और वरदा मुद्राएं देती हैं। उसके शुभ शक्ति के रूप में उसके क्रूर रूप के कारण देवी कालरात्रि को देवी शुभंकरी के रूप में भी जाना जाता है।

कालरात्रि (कभी-कभी कालरात्रि की वर्तनी) देवी दुर्गा के नौ रूपों में से सातवीं हैं, जिन्हें नवदुर्गा के रूप में जाना जाता है। उन्हें पहली बार दुर्गा सप्तशती, मार्कण्डेय पुराण के अध्याय 81-93, देवी दुर्गा पर सबसे पहले ज्ञात साहित्य में संदर्भित किया गया है।

कालरात्रि को व्यापक रूप से मातृ देवी के कई विनाशकारी रूपों में से एक माना जाता है, जिसमें काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, मृत्‍यु, रुद्राणी, चामुंडा,

नवरात्री पूजा के सातवें दिन को विशेष रूप से उसे समर्पित किया जाता है और उसे देवी का उग्र रूप माना जाता है, उसकी उपस्थिति स्वयं भय उत्पन्न करती है।

माना जाता है कि देवी के इस रूप को सभी दानव संस्थाओं, भूतों, आत्माओं और नकारात्मक ऊर्जाओं का नाश करने वाला माना जाता है, जो उनके आगमन का पता चलने पर भाग जाते हैं।

पूजा विधि:

माँ कालरात्रि की पूजा के लिए लाल रंग के कपडे पहनने चाहिए। मकर और कुम्भ राशि के बालको का कालरात्रि माता की पूजा जरूर करनी चाहिए। सप्तमी की रात को तिल या तेल की अखंड ज्योति जगाये।

माता को सात नीम्बुओं की माला अर्पण करे। काली चालीसा, काली स्त्रोत,या फिर काली पुराण का पाठ करे। कालरात्रि माता को गुड़ का भोग लगाया जाता है।

मां कालरात्रि का शत्रुबाधा मुक्ति मंत्र:


त्रैलोक्यमेतदखिलं रिपुनाशनेन त्रातं समरमुर्धनि तेSपि हत्वा।
नीता दिवं रिपुगणा भयमप्यपास्त मस्माकमुन्मद सुरारिभवम् नमस्ते।।

मां कालरात्रि को शहद का भोग लगायें।

8। अष्टम– माता महागौरी:

devi mahagauri

माँ दुर्गा की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। इनकी उपासना करने से भक्तो के सभी पाप धूल जाते है, पहले जन्मो में किये पाप भी नष्ट हो जाते है। वह मनुष्य सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यो का अधिकारी हो जाता है।

अष्टमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए देवी मां को चुनरी भेंट करती हैं। देवी गौरी की पूजा का विधान भी पूर्ववत है अर्थात जिस प्रकार सप्तमी तिथि तक आपने मां की पूजा की है उसी प्रकार अष्टमी के दिन भी प्रत्येक दिन की तरह देवी की पंचोपचार सहित पूजा करते हैं।

माँ महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए बहुत कल्याणकारी है। हमें सदैव इनका ध्यान करना चाहिए। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मन को अनन्य भाव से एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिए।

महागौरी भक्तों का कष्ट अवश्य ही दूर करती हैं। इनकी उपासना से सभी भक्तो के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

पुराणों में माँ महागौरी की महिमा का प्रचुर आख्यान किया गया है। ये मनुष्य के जीवन को सत्य की ओर प्रेरित करके असत्य का विनाश करती हैं।
या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।

मां महागौरी का परम ऐश्वर्य सिद्धि मंत्र:

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणी नमोsस्तुते।।

महागौरी मां को साबूदाने की खीर का भोग लगायें।

9। नवम-माता सिद्धिदात्री:

दुर्गा माता के सिद्धि और मोक्ष देने वाले स्वरूप को सिद्धिदात्री कहते हैं। वह देवी है जो अपने भक्तों को सभी प्रकार की सिद्धियों का अधिकारी और सर्वश्रेष्ठ बनाती है।

नवरात्र के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। धार्मिक आस्था है कि मां की पूजा पूरे विधि-विधान से करने पर मां सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। मां की पूजा से यश, बल और धन की प्राप्ति होती है।

यहां तक ​​कि भगवान शिव ने देवी सिद्धिदात्री की कृपा से सभी सिद्धियां प्राप्त कीं। वह केवल मनुष्यों द्वारा ही नहीं, बल्कि देव, गंधर्व, असुर, यक्ष और सिद्धों द्वारा भी पूजी जाती है। जब भगवान सिद्धिदात्री अपने बाएं आधे भाग से प्रकट हुईं, तब भगवान शिव को अर्ध-नरिश्वर की उपाधि मिली।

अपने साधक भक्तों को महाविद्या और अष्ट सिद्धियां प्रदान करती हैं। मान्यता है कि सभी देवी-देवताओं को भी मां सिद्धिदात्री से ही सिद्धियों की प्राप्ति हुई है। अपने इस स्वरूप में माता

सिद्धिदात्री कमल पर विराजमान हैं और हाथों में कमल, शंख, गदा, सुदर्शन चक्र धारण किए हुए हैं। सिद्धिदात्री देवी सरस्वती का भी स्वरूप हैं, जो श्वेत वस्त्रालंकार से युक्त महाज्ञान और मधुर स्वर से अपने भक्तों को सम्मोहित करती हैं।

पूजा विधि:

नौवें दिन सिद्धिदात्री को मौसमी फल, हलवा, पूड़ी, काले चने और नारियल का भोग लगाया जाता है। जो भक्त नवरात्रों का व्रत कर नवमीं पूजन के साथ व्रत का समापन करते हैं, उन्हें इस संसार में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इस दिन दुर्गासप्तशती के नवें अध्याय से मां का पूजन करें। मां की पूजा के बाद छोटी बच्चियों और कुंवारी कन्याओं को भोजन कराना चाहिए। भोजन से पहले कन्याओं के पैरा धुलवाने चाहिए।

सिन्दूर का टिका लगाना चाहिए। उन्हें मां के प्रसाद के साथ दक्षिणा दें और उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। नवमी के दिन पूजा करते समय बैंगनी या जामुनी रंग पहनना शुभ रहता है। यह रंग अध्यात्म का प्रतीक होता है।

सर्वमनोकामना पूरक महागौरी मंत्र:

या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः।
श्रद्धा सतां कुलजन प्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्।।
मां सिद्धिदात्री को पायस का भोग लगायें।

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