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नव दुर्गा नवरात्री पर्व कथा पूजन महत्व एवम कविता

Navratri Navdurga Pooja Vidhi Mahatav Aur Kavita in Hindi

नवरात्री 10 अक्टूबर
दशहरा 19 अक्टूबर
दीपावली 7 नवम्बर

हिंदू धर्म में साल के 365 दिन कोई ना कोई त्यौहार अवश्य होता है, और इस धर्म की सबसे खास बात यह है की सभी त्योहार यहां पर बड़ी ही धूमधाम से मनाये जाते हैं। इन्हीं में से एक त्यौहार है नवरात्रि जिसे दुर्गा पूजा भी कहा जाता है। हिंदुओं में इसकी बहुत मान्यता है नवरात्रि का मतलब नवरात्रि होता है, जिसमें मां दुर्गा देवी की नौ रूपों में पूजा की जाती है। नवरात्रि के खत्म होते ही ठीक दसवें दिन दशहरा मनाया जाता है, और इसके 20 दिन बाद दिवाली का त्यौहार बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है।

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नवरात्रि के समय दुर्गा मां की सुंदर-सुंदर प्रतिमाएं बनाकर स्थापित की जाती हैं तथा उनकी विधि पूर्वक पूजा की जाती है। कुछ लोग 9 के 9 दिन व्रत रखते हैं तो कुछ लोग इनमें से किसी विशेष 2 दिन व्रत रखते हैं।

नवरात्री सायरी व कविता ( Nav Durga Shayari Kavita )

लक्ष्मी का हाथ हो,
सरस्वती का साथ हो.
गणेश का निवास हो,
और माँ दुर्गा के आशीर्वाद से
आपके जीवन में प्रकाश ही प्रकाश हो….
!! हैप्पी नवरात्री !!

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सिंह पर सवार आई मैया 
प्यार और दुलार लाई मैया 
करते माँ तेरा वंदन 
चढ़ाकर पुष्प सुगंधित चन्दन

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जगत पालन हार है माँ
मुक्ति का धाम है माँ!
हमारी भक्ति के आधार है माँ,
हम सब की रक्षा की अवतार है माँ…
!! जय माता दी !!

 

नवरात्रि कब मनाई जाती है

नवरात्रि को साल में 4 बार मनाया जाता है जिनमें से 2 मुख्य नवरात्रि तथा 2 गुप्त नवरात्रि होती हैं।

माघ नवरात्रि- यह गुप्त नवरात्रि जनवरी-फरवरी महीने के समय में मनाई जाती है। इसे भारत में बहुत कम स्थानों में मनाया जाता है। हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश इसे मनाने वाले मुख्य राज्य हैं।

चैत्र नवरात्रि- इस नवरात्रि को शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है। इसे बसंत नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। यह नवरात्रि मार्च-अप्रैल के महीने में आती है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र नवरात्रि से ही नए वर्ष की शुरुआत होती है। इस नवरात्रि के नौवें दिन रामनवमी मनाई जाती है।

अषाढ़ नवरात्री– इसे भी गुप्त नवरात्रि कहा जाता है जो जून-जुलाई के महीने में मनाई जाती है इस नवरात्रि में देवी गायत्री या देवी शाकम्भरी की पूजा का महत्व होता है

शरद नवरात्रि- हिंदू धर्म में मनाई जाने वाली मुख्य नवरात्रि है। इसे शुक्ल पक्ष में मनाया जाता है जिसके बाद दीपावली व दशहरा मनाया जाता है इसे महा नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है।

 

नवरात्रि नव दुर्गा पूजा विधि व महत्व ( Nav Durga Navratri Pooja Vidhi Mahatav )

दुर्गा पूजा बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाई जाती है। नवरात्रि के दिनों में ही देवी दुर्गा ने महिशासुर नामक राक्षस का वध किया था।
भारत के लगभग सभी राज्यों में नवरात्रि बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है। बेशक सभी की पूजा विधि अलग हो लेकिन सभी जगह समान रूप से देवी के 9 दिन नौ रूपों की पूजा की जाती है।

 

नवदुर्गा के नाम ( Devi Ke 9 Roopo ke Naam )

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माता शैलपुत्री नवरात्री का प्रथम दिन माता शैलपुत्री का होता है। यह देवी दुर्गा का ही रूप है। माता ने अपने इस रूप मे शैलपुत्र हिमालय के घर जन्म लिया था। माता अपने इस रूप मे उनके एक हाथ मे त्रिशूल और दूसरे हाथ मे कमल का फूल है। माता दुर्गा के इस रूप की पूजा अच्छी सेहत के लिए लाभदायी है.

माता ब्रांहमचारिणी Navratri का दूसरा दिन माता ब्रहमचारिणी को समर्पित है. माता ने अपने इस रूप मे भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तप किया था। इस रूप में देवी अपने एक हाथ मे कमंडल और दूसरे हाथ मे जप की माला धारण किये है. इस दिन माता को शक्कर का भोग लगाया जाता है। माता के इस रूप का पूजन दीर्घ आयु प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

माता चंद्रघंटा  नवरात्रि के तीसरे दिन माता चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इसे देवी का उग्र रूप कहा जाता है, फिर भी देवी के इस रूप से भक्तो को सभी कष्टो से मुक्ति मिलती है। माँ के इस रूप मे 10 हाथ है तथा सभी हाथो मे माँ ने शस्त्र धारण किए हुये है।

माता कृषमांडा – Navratri का चौथा दिन देवी कृषमांडा के पूजन का है। ऐसा कहा जाता है कि माता के इस रूप मे हसी से ब्रहमांड की शुरवात हुई थी। देवी के इस रूप मे 8 हाथ है और उन्होने अपने इन 8 हाथो मे धनुष बांड, कमंडल, कमल, अमृत कलश, चक्र तथा गदा लिए हुए है। माता के आठवे हाथ मे इच्छा अनुसार वर देने वाली जप की माला विद्यमान है, अर्थात यह माला माता के भक्तो को उनकी इच्छा अनुसार वरदान प्रदान करती है.

माता स्कंदमाता – Navratri मे पाचवे दिन माता स्कंदमाता देवी की पूजा होती है. माता का यह रूप भक्तो को उनके सारे पापो से मुक्ति दिलाता है। नवरात्रि के इस दिन माता स्कंदमता को अलसी नामक औषधि अर्पण करनी चाहिए। ऐसा करने से मौसम मे होने वाली बीमारी नहीं होती और इंसान स्वस्थ रहता है। इस रूप मे माता कमल पर विराजमान है। माता अपने इस रूप मे 4 भुजाओ वाली है वे अपने 2 हाथो मे कमल लिए हुए है, एक हाथ मे माला लिए हुए है तथा एक हाथ से भक्तो को आशीर्वाद दे रही है।

माता कात्यानि – Nav Durga मे छटे दिन देवी के इस रूप की पूजा की जाती है। कहा जाता है की देवी के इस रूप को कत्यान ऋषि ने अपनी घोर तपस्या से प्राप्त किया था। तथा देवी ने अपने इसी रूप मे महिशासुर का वध किया था। कहा जाता है की कृष्ण भगवान को अपने पति के रूप मे पाने के लिए गोपियो ने देवी के इसी रूप का पूजन किया था. अगर कोई भी लड़की देवी के इसरूप की सच्चे मन से पूजा करे, तो उसके विवाह मे आने वाली सभी बधाये दूर होती है और उसे मनचाहा वर मिलता है. शादी में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए माता कात्यानि के मंत्र अवश्य पढ़े।

माता कालरात्री –  नव दुर्गा के सातवे दिन देवी के इस रूप की पूजा जाती है। परंतु कई लोग देवी कालरात्रि को कालिका देवी समझ लेते है पर ऐसा नहीं है दोनों ही देवी के अलग अलग रूप है। यह देवी का बहुत ही भयानक रूप है। इस रूप मे देवी एक हाथ मे त्रिशूल और एक हाथ मे खड़ग लिए है तथा अपने गले मे भी खडगो की माला पहनी हुई है। देवी के इस रूप मे पूजन से सभी बुरी शक्तियों का नाश होता है।

माता महागौरी –  नवरात्री के आठवे दिन माता गौरी की पूजा की जाती है। यह माता का सरल तथा बहुत ही सुंदर रूप है. माता अपने इस रूप मे वृषभ पर विराजमान है। उनके 2 हाथो मे त्रिशूल और डमरू है तथा अन्य 2 हाथो से वह अपने भक्तो को वरदान और अभयदान देती हैं।कहा जाता है की माता के इस रूप मे भगवान शंकर ने माता का गंगाजल से अभिषेक किया था, इसलिए माता को यह गौर वर्ण प्राप्त हुआ।

माता सिध्दीदात्री Nav Durga के नौवे दिन देवी के इस रूप की पूजा की जाती है। इन्ही के पूजन से नवदुर्गा की पूजा सम्पन्न होती है तथा भक्तो की मनोकामना पुराण होती है। इस रूप मे माता कमल पर विराजमान है। पर कहा जाता है कि माता का वाहन सिह है। इस रूप मे 4 हाथो मे माता ने शंख, चक्र, गदा तथा कमल लिया हुआ है.

 

नवरात्री पूजा विधि ( Navratri Pooja Vidhi )

नवरात्रि में देवी की पूजा विधि का विशेष रुप से ध्यान रखना बहुत ही अनिवार्य है। क्योंकि देवी की पूजा में गलती होने से देवी नाराज हो जाती है। इसीलिए जहां भी देवी को विराजमान किया जाता है पंडितों द्वारा नौ के नौ दिन सावधानी बरती जाती है। यदि देवी को घर में विराजमान किया गया है तो भी सावधानी बरतना अनिवार्य है।

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना पूजा विधि

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है और इस दिन से 9 दिन तक देवी की पूजा की जाती है। कलश स्थापना को सदैव सुबह के समय में ही करना चाहिए। इसमें विशेष रूप से उपयोग में लाने वाली वस्तुएं हैं :-

-एक चौड़ा मिट्टी का बर्तन या गमला
-सिक्के
-मोली
-इत्र
-सुपारी
-गंगा जल
-फूल या माला
-दूर्वा
-साफ मिट्टी धान्य बोने के लिए
-कलश के रूप में ताम्बे या पीतल का लौटा
-5 आम या अशोक के पत्ते
-अक्षत(चावल)
-नारियल
-लाल कपड़ा

कलश पूजा  (Kalash Pooja)

– पूजा के आरंभ से पहले स्नान करना अनिवार्य है।

– सर्वप्रथम गणेश जी का आवाहन किया जाता है। फिर देवी मां की अखंड ज्योत जलाई जाती है।

– इसके पश्चात कलश स्थापना की जाती है। मिट्टी का बर्तन लेकर उसमें मिट्टी की परत बिछाएं,
मिट्टी की परत में बीज डालें और इसे मिट्टी से ढक दें। अब इसमें थोड़े से और बीज डालें और फिर से मिट्टी से ढक दें।

– ऐसी मिट्टी की तीन परत डालकर उसमें थोड़ा सा पानी डाल दे ताकि मिट्टी और बीज अपने स्थान पर जम जाए।

– अब एक तांबे का लोटा लें और उस के ऊपरी हिस्से पर मौली बांध ले। लोटे में पानी भर उसमें कुछ बूंदें गंगाजल की डालें फिर उसमें दूर्वा, सवा रुपइया, सुपारी, अक्षत(चावल) व इतर डालें।

– कलश के मुख में आम के 5 पत्ते दाल दे यदि आम के पत्ते ना मिले तो अशोक के पत्तों का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

– अब एक नारियल लेकर उसे लाल कपड़े में लपेटकर ऊपर से मौली बांध ले और उसे कलश के ऊपर रख दें।

– इस कलश को उस मिट्टी के बर्तन के बीचो बिच में रखें।

कलश स्थापना के पश्चात घट स्थापना की जाती है। घट स्थापना के लिए बर्तन में मिट्टी भरकर उसमें माता के जवारे बोए जाते हैं तथा इसकी 9 दिनों तक बड़ी ही सावधानी से देखभाल की जाती है।

अब 9 दिनों तक विधि पूर्वक देवी की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि जो लोग नवरात्रि के 9 दिन व्रत रख माता की ज्योत जगाते हैं उन्हें 9 दिन तक घर को खाली छोड़ कर बाहर नहीं जाना चाहिए।

इसके पश्चात कुछ लोग अष्टमी पर पूजा कर देवी मां को विदा करते हैं तो कुछ लोग नवमी पर पूजा करते हैं।

 

अष्टमी नवमी के पूजन विधि ( Ashtami Navami Puja Vidhi )

भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रूप से अष्टमी नवमी की पूजा की जाती है। कई जगहों पर अष्टमी नवमी पर हवन या पूजन किया जाता है तो कुछ जगहों पर कन्या पूजन का विधान है।

अष्टमी या नवमी के दिन छोटी-छोटी कन्याओ को घर में बुलाकर उन्हें भोजन कराया जाता है। इसमें पूरी छोले, हलवा, खीर आदि कन्याओं को खिलाए जाते हैं और कन्याओं को देवी का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है। इसके साथ-साथ कन्याओं को उपहार भी दिए जाते हैं तो कुछ लोग उपहार स्वरूप ऐसे भी देते हैं।

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