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निर्जला एकादशी (NIRJALA EKADASHI) व्रत कथा एवं पूजा विधि

NIRJALA EKADASHI OR BHIMSENI EKADASHI

NIRJALA EKADASHI
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जय श्री कृष्ण | ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी (NIRJALA EKADASHI)  कहा जाता है इस दिन कोई भी उपाय पुरे मन से किया जाए तो जीवन में सफलता ही सफलता मिलती चली जाती है | निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास में आती है और ज्येष्ठ का मतलब होता ही बड़ा होता है | श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा करने से भगवान लक्ष्मी नारायण प्रसन्न होते हैं और हमें मनवांछित फल देते है | निर्जला एकादशी भगवान नारायण की सबसे प्रिय एकादशी होती है और विशेष उपाय करने से आपको सारे कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी और आपके घर में खुशियां ही खुशियां आने लगेंगी | आपके सभी दोष समाप्त हो जाएंगे | आपकी सारी बाधाओं का अंत तुरंत हो जायेगा |

निर्जला एकादशी (NIRJALA EKADASHI) की पूजा विधि

निर्जला एकादशी

सबसे पहले हमें प्रातः काल उठकर स्नान आदि करने के बाद सूर्य देवता को जल अर्पित करना चाहिए | उसके बाद पीले वस्त्रों को धारण करके भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और भगवान विष्णु को पीले फूल अर्पित करने चाहिए | पंचामृत तैयार करके उसका भोग लगाना चाहिए | उसके बाद भगवान विष्णु और माता  लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करना चाहिए | कोई भी निर्धन व्यक्ति दिखे तो उसको भोजन कराना चाहिए | यदि उसके पास वस्त्र न हो तो वस्त्रो का दान करना चाहिए | यदि हो सके तो इस दिन निर्जल उपवास भी रखना चाहिए और केवल जरूरत पड़ने पर ही जल ग्रहण करना चाहिये | इस दिन केवल जल और फल ग्रहण करके ही उपवास रखना चाहिए और पूरे दिन भर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और रात में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के मंत्रों का जाप करना चाहिए | इस दिन जल और जल डालने वाले पात्रों का दान भी किया जा सकता है जो बहुत ही लाभकारी होता है |

निर्जला एकादशी (NIRJALA EKADASHI) व्रत कथा

एक बार भीमसेन जी व्यास जी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु मैं उनसे कहता हूँ कि भाई मैं भगवान की भगती पूजा आदि तो कर सकता हूँ, दान भी दे सकता हूँ परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता।

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इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों एकादशियों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूँ कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्षभर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूँ, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है।
अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एका‍दशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है।
व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और काँपकर कहने लगे कि अब क्या करूँ ? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हाँ वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूँ। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए।

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यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है।
यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है।
व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है।

जो मनुष्य निर्जला एकादशी (NIRJALA EKADASHI)  का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौदान करना चाहिए।

इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूँ, दूसरे दिन भोजन करूँगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूँगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएँ। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढँक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए।
जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है।

हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है |

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