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मन की शांति के लिए शक्तिशाली शांति मंत्र और उनके अर्थ

Shanti Mantr 

शांति मंत्रो के उच्चारण की शुरुवात “ॐ” से होती हैं। ॐ या ओम को प्रचलित ध्वनि माना जाता है यानि की ब्रह्मांड की वह ध्वनि जिससे अन्य सभी ध्वनियाँ बनती हैं। शब्दांश ओम चेतना के तीनो लोकों का प्रतिनिधित्व करता है।

शांति मंत्रो का उच्चारण आम तौर पर धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत और अंत में किया जाता है। जिस से आस पास के पर्यावरण और मन को शांति प्राप्त होती हैं।

shanti-mantr

माना जाता है कि शांति मंत्रों के जाप से कार्य शुरू होने में आने वाली बाधाओं को दूर किया जा सकता है।

शांति मंत्र हमेशा “शांति” शब्द के तीन उच्चारणों के साथ समाप्त होता है।

ॐ असतो मा मंत्र – Om Asato Maa Mantra

ॐ असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्मा अमृतं गमय ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

Om Asato Maa Sad-Gamaya ।
Tamaso Maa Jyotir-Gamaya ।
Mrityor-Maa Amrtam Gamaya ।
Om Shaantih Shaantih Shaantih ।।

अर्थ:

असतो मा सद्गमय – असत्य से सत्य की ओर! असत्य अहंकार या मृत्यु है। सत्य शाश्वत और अमर है। इसलिए जब आप सत्य का मार्ग चुनते हैं, तो मृत्यु का कोई सवाल ही नहीं उठता। इसलिए, भगवान का अनुभव करने के लिए, हमें अहंकार का जितना जल्दी हो सके नाश करना चाहिए।

तमसो मा ज्योतिर्गमय – ज्ञान प्रकाश है तमस अंधकार है। और प्रकाश के साथ अंधकार दूर हो जाता है। अंधकार मृत्यु है। प्रकाश सत्य, आनंद, शांति है। प्रकाश शाश्वत है।

मृत्योर्मा अमृतं गमय – मुझे मेरे उद्देश्य की शुद्धता के माध्यम से मृत्यु से अमरता की ओर ले जाओ।

ओम् शांति, शांति, शांति!

संपूर्ण अर्थ-
(हे प्रभु !) ‘‘असत्य से सत्य की ओर मुझे ले चलो, अंधकार से ज्योति की ओर मुझे ले चलो, मृत्यु से अमृत की ओर मुझे ले चलो।’’

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ॐ सह नाववतु मंत्र – Om Sahanavavatu Mantra

ॐ सह नाववतु ।
सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

Om Saha Naav[au]-Avatu ।
Saha Nau Bhunaktu ।
Saha Viiryam Karavaavahai ।
Tejasvi Naav[au]-Adhiitam-Astu Maa Vidvissaavahai ।
Om Shaantih Shaantih Shaantih ।।

अर्थ:

ॐ = परमात्मा-परमेश्वर-परमब्रम्ह ; नौ = हम दोनों (गुरू और शिष्य) को ; सह = साथ-साथ ; भुनक्तु = पोषित हों ; सह =साथ-साथ ; वीर्यं = शक्ति को ; करवावहै = प्राप्त करें ; नौ = हम दोनों की ; अवधीतम् =पढी हुई विद्या ; तेजस्वि = तेजोमयी ; अस्तु = हो ; मा विद्विषावहै = (हम दोनों) परस्पर द्वेष न करें।

संपूर्ण अर्थ-
हे परमात्मन् ! आप हम दोनों गुरू और शिष्य की साथ- साथ रक्षा करें , हम दोनों का पालन-पोषण करें, हम दोनों साथ-साथ शक्ति प्राप्त करें,हमारी प्राप्त की हुई विद्या तेजप्रद हो, हम परस्पर द्वेष न करें, परस्पर स्नेह करें।

 

ॐ सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु मंत्र – Om Sarveshaam Mantra

ॐ सर्वेशां स्वस्तिर्भवतु ।
सर्वेशां शान्तिर्भवतु ।
सर्वेशां पुर्णंभवतु ।
सर्वेशां मङ्गलंभवतु ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

Om Sarveshaam Svastir-Bhavatu ।
Sarveshaam Shaantir-Bhavatu ।
Sarveshaam Purnnam-Bhavatu ।
Sarveshaam Manggalam-Bhavatu ।
Om Shaantih Shaantih Shaantih ।।

अर्थ:

सभी को खुशी की प्राप्ति हो, सभी के मन को शांति मिले, सभी में पूर्णता हो, सभी को जीवन में सफलता मिले।

ॐ भद्रं कर्णेभिः मंत्र – Om Bhadram Karnebhih Shrnuyama Devah

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवागँसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायूः ।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

Om Bhadram Karnnebhih Shrnnuyaama Devaah ।
Bhadram Pashyema-Akssabhir-Yajatraah ।
Sthirair-Anggais-Tussttuvaamsas-Tanuubhih ।
Vyashema Devahitam Yad-Aayuh ।
Svasti Na Indro Vrddha-Shravaah ।
Svasti Nah Puussaa Vishva-Vedaah ।
Svasti Nas-Taakssaryo Arisstta-Nemih ।
Svasti No Vrhaspatir-Dadhaatu ।।
Om Shaantih Shaantih Shaantih ।।

अर्थ:

यह अथर्ववेदीय शान्ति पाठ है जिसका अर्थ है-
ॐ हे देवगण! हम कानो से कल्याणरूप वचन सुने।
हम नेत्रों से शुभ दर्शन करे।.
सुगठित अंगों एवं शरीर से जब तक आयु है देवहित में स्तवन करते रहें।
महान कीर्ति वाला इंद्र हमारा कल्याण करे।
विश्व का जानने वाला सूर्य हमारा कल्याण करे।
आपत्तियां आने पर चक्र के समान घातक गरुण हमारा कल्याण करें।
बृहस्पति हमारा कल्याण करे।
ॐ शान्ति शान्तिः शान्तिः॥

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ओम पुराणमदं पुरनामिदम् – Om Purnamadah Purnamidam

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पुर्णमुदच्यते
पूर्णश्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

Om Puurnnam-Adah Puurnnam-Idam Puurnnaat-Purnnam-Udacyate
Puurnnashya Puurnnam-Aadaaya Puurnnam-Eva-Avashissyate ।।
Om Shaantih Shaantih Shaantih ।।

अर्थ:

अर्थात वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।
ओम्! शांति! शांति! शांति!

 

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः – Om Sarve Bhavantu Sukhinah

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

Om Sarve Bhavantu Sukhinah
Sarve Santu Nir-Aamayaah ।
Sarve Bhadraanni Pashyantu
Maa Kashcid-Duhkha-Bhaag-Bhavet ।
Om Shaantih Shaantih Shaantih ।।

अर्थ:

सभी खुश हो जाएं,
किसी को कोई भी बिमारी न हो।
सब जगह शुभ ही शुभ दिखाई दे,
कभी किसी को कोई दुःख न हो।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

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