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षटतिला एकादशी की व्रत विधि आरती एवं शुभ मुहूर्त

Shattila Ekadashi Vrat Katha

तिथि  दिन  एकादशी का समय 
31 जनवरी 2019 गुरूवार 30 जनवरी सायं 03:33 बजे से 31 जनवरी 2019 सायं 05:02 बजे तक 

shattila ekadashi

माघ महीने के हर दिन को पवित्र माना जाता है लेकिन एकादशियों के दिनों का अपना विशेष महत्व होता है। माघ महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी मनाई जाती है। षटतिला एकादशी का व्रत के करने से पूर्व जन्म में किये गये सभी पापों से मुक्ति मिलती है और मनुष्य की सम्पूर्ण मनोकामनाएँ पूर्ण होती है। एकादशियों पर व्रत, दान-पुण्य आदि करना बहुत ही शुभ माना जाता हैं लेकिन माघ मास चूंकि पावन मास कहलाता है इसलिये इस मास की एकादशियों का महत्व ओर भी बढ़ जाता है।

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षटतिला एकादशी पर क्या खास होता है

माघ के महीने में शीत ऋतु अपने चरम पर होती है और इस मास के समाप्त होने के साथ ही ठंड भी कम होने लगती है। इस मौसम में तिलों का बहुत उपयोग किया जाता है क्योंकि यह सर्दियों में बहुत ही लाभदायक रहता है। इसलिये दान, तर्पण, आहार आदि में तिलों का प्रयोग किया जाता है। इस माह में तिलों का छह प्रकार से उपयोग किया जाता है

तिल से स्नान

तिल का उबटन

तिलोदक

तिल का हवन

तिल से बने भोजन

तिल का दान

तिल के छह प्रकार से इस्तेमाल करने के कारण ही इसे षटतिला कहा जाता है।

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षटतिला एकादशी व्रत विधि

षटतिला एकादशी का उपवास अन्य एकादशियों के उपवास से थोड़ा भिन्न तरीके से रखा जाता है। इस एकादशी में कृष्ण पक्ष की दशमी को भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए गायं के गोबर में तिल मिलाकर उसके 108 उपले बनाये जाते हैं।

दशमी तिथि में दिन में केवल एक समय भोजन किया जाता है और पुरे दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। रात्रि में 108 बार “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का उच्चारण करते हुए तिल वाले उपलों से हवन करना चाहिए।

षटतिला एकादशी व्रत की कथा

एक बार देवर्षि नारद, भगवान विष्णु के लोक में जाकर भगवन श्री हरी से माघ मास की कृष्ण एकादशी के महत्व के बारे में पूछते है। श्री हरि नारद के अनुरोध पर कहने लगे हे देवर्षि इस एकादशी का नाम षटतिला एकादशी है। पृथ्वीलोक पर एक निर्धन ब्राह्मणी मुझे बहुत मानती थी। दान पुण्य करने के लिये उसके पास कुछ नहीं था लेकिन मेरी पूजा, व्रत आदि वह श्रद्धापूर्वक करती थी। एक बार मैं स्वंय उसके भिक्षा के लिये उसके घर जा पंहुचा

उसके पास कुछ देने के लिये कुछ था नहीं तो क्या करती है उसने मुझे मिट्टी का एक पिंड दे दिया। कुछ समय पश्चात जब उसकी मृत्यु होती है तो वह अपने आप को एक मिट्टी के खाली झौंपड़े में पाती है जहां एक आम का पेड़ ही उसके साथ था। वह भगवान से पूछती है कि हे भगवन मैनें तो हमेशा आपकी पूजा की है फिर मेरे साथ यहां स्वर्ग में भी ऐसा क्यों हो रहा है। तब मैनें उसे भिक्षा वाला वाकया सुना दिया, ब्राह्मणी पश्चाताप करते हुए विलाप करने लगी।

तब मैने उससे कहा कि जब देव कन्याएं आपके पास आयें तो दरवाजा तब तक न खोलना जब तक कि वह आपको षटतिला एकादशी की व्रत विधि न बता दें। उसने वैसा ही किया। फिर व्रत का पारण करते ही उसकी कुटिया अन्न धन से भरपूर हो गई और वह बैकुंठ में अपना जीवन हंसी खुशी बिताने लगी। इसलिये हे नारद जो कोई भी इस दिन तिलों से स्नान और दान करता है। उसके भंडार अन्न-धन से भर जाते हैं और उतने ही हजार साल तक वह बैकुंठ लोक में स्थान पाता है।

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