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विजया एकादशी व्रत का महत्व विधि एवम कथा

VIJAYA EKADASHI VRAT KATHA AND VIDHI

विजया एकादशी व्रत का हिन्दू धर्म में अन्य व्रतों की तरह बहुत महत्व है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी के रूप में मनाई जाती है। इस व्रत में भगवान श्री हरी विष्णु की पूजा की जाती है और इस व्रत के प्रभाव से समस्त पापों का नाश होता है और इस व्रत के नाम के अनुरूप फल मिलता है।

तिथि  दिन  शुभ मुहूर्त 
2 मार्च 2019 शनिवार 3 मार्च 2019 को सुबह 6 बजकर 44 मिनट से 9 बजकर 04 मिनट त

विजया एकादशी व्रत का महत्व

विजया एकादशी व्रत को सभी व्रतों में सबसे प्राचीन माना जाता है। पुराणों के अनुसार स्वयं भगवान महादेव ने नारद जी को उपदेश देते हुए कहा था कि, ‘एकादशी व्रत महान पुण्य देने वाला होता है’। जो भी मनुष्य विजया एकादशी का व्रत रखता है उसके पित्रों और पूर्वजों के पाप समाप्त हो जाते है और वे स्वर्ग लोक को जाते हैं। इस व्रत के प्रभाव से हर काम में सफलता मिलती है और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

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विजया एकादशी व्रत विधि

  • विजया एकादशी व्रत के लिए एक दिन पहले स्वर्ण, चांदी, तांबे या मिट्टी का एक कलश बनाएं
  • एकादशी के उस कलश में पानी भरकर वेदी पर स्थापित करें और उस कलश के नीचे सतनजा अर्थात मिले हुए सात अनाज और ऊपर जौ रखें।
  • भगवान विष्णु की मूर्ति की स्थापना करें
  • धूप, दीप, नैवेद्य, तुलसी, नारियल आदि से भगवान श्री हरि का पूजन करें
  • उपवास के साथ-साथ भगवन कथा का पाठ व श्रवण करें
  • रात्रि में भगवान श्री हरि के नाम का भजन कीर्तन करना चाहिए
  • द्वादशी के दिन गरीबों को दान दक्षिणा और ब्राह्मणों को भोजन आदि करवाएं व कलश को दान कर दें

विजया एकादशी के दिन सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इस प्रकार विधि पूर्वक उपवास रखने से उपासक को कठिन से कठिन हालातों पर भी विजय प्राप्त होती है। भगवान श्री रामचंद्र जी ने विधिपूर्वक विजया एकादशी का व्रत किया और इसके प्रभाव से उन्होंने भी राक्षसों के ऊपर विजय प्राप्त की।

विजया एकादशी व्रत कथा

देवर्षि नारद ने जगत पिता ब्रह्माजी से फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का व्रत तथा उसकी विधि के बारे में पुछा। ब्रह्माजी ने कहा- ‘हे पुत्र! विजया एकादशी का व्रत पूर्व जन्म के पाप तथा वर्तमान के पापों को नष्ट करने वाला है और यह व्रत करने वाले सभी मनुष्यों को विजय प्रदान करती है।

इस व्रत को भगवान श्री राम ने किया था। जब उनको चौदह वर्ष का वनवास मिला और वे भ्राता लक्ष्मण तथा माता सीता सहित पंचवटी में निवास करने लगे। उस समय महापापी रावण ने माता सीता का हरण कर लिया।

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इस दुःखद घटना से श्रीरामजी तथा लक्ष्मणजी अत्यंत दुखी हुए और सीताजी की खोज में वन-वन भटकने लगे। जंगल-जंगल घूमते हुए, वे मरणासन्न जटायु के पास जा पहुंचे। जटायु ने उन्हें माता सीता के हरण का पूरा वृत्तांत सुनाया और भगवान श्रीरामजी की गोद में प्राण त्यागकर स्वर्ग की तरफ प्रस्थान किया। कुछ आगे चलकर श्रीराम व लक्ष्मण की सुग्रीवजी के साथ मित्रता हो गई और वहां उन्होंने बालि का वध किया।

श्रीराम भक्त हनुमानजी ने लंका में जाकर माता सीता का पता लगाया और माता से श्रीरामजी तथा महाराज सुग्रीव की मित्रता का वर्णन सुनाया। वहां से लौटकर हनुमानजी श्रीरामचंद्रजी के पास आए और अशोक वाटिका का सारा वृत्तांत कह सुनाया।

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सब हाल जानने के बाद श्रीरामचंद्रजी ने सुग्रीव की सहमति से वानरों तथा भालुओं की सेना सहित लंका की तरफ प्रस्थान किया। समुद्र किनारे पहुंचने पर श्रीरामजी ने विशाल समुद्र को घड़ियालों से भरा देखकर लक्ष्मणजी से कहा- ‘हे लक्ष्मण! अनेक मगरमच्छों और जीवों से भरे इस विशाल समुद्र को कैसे पार करेंगे?’

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प्रभु श्रीराम की बात सुनकर लक्ष्मणजी ने कहा- ‘भ्राताश्री! आप पुराण पुरुषोत्तम आदिपुरुष हैं। आपसे कुछ भी विलुप्त नहीं है। यहां से आधा योजन दूर कुमारी द्वीप में वकदाल्भ्य मुनि का आश्रम है। वे अनेक नाम के ब्रह्माओं के ज्ञाता हैं। वे ही आपकी विजय के उपाय बता सकते हैं’

अपने छोटे भाई लक्ष्मणजी के वचनों को सुन श्रीरामजी वकदाल्भ्य ऋषि के आश्रम में गए और उन्हें प्रणाम कर एक ओर बैठ गए। अपने आश्रम में श्रीराम को आया देख महर्षि वकदाल्भ्य ने पूछा- ‘हे श्रीराम! आपने किस प्रयोजन से मेरी कुटिया को पवित्र किया है, कृपा कर अपना प्रयोजन कहें प्रभु!’

मुनि के मधुर वचनों को सुन श्रीरामजी ने कहा- ‘हे ऋषिवर! मैं सेना सहित यहां आया हूँ और राक्षसराज रावण को जीतने की इच्छा से लंका जा रहा हूं। कृपा कर आप समुद्र को पार करने का कोई उपाय बताएं। आपके पास आने का मेरा यही प्रयोजन है।’

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तब महर्षि वकदाल्भ्य ने भगवान राम को विजया एकादशी के अति उत्तम व्रत के बारे में बतलाया। जिसके करने के फलसवरूप भगवान राम को रावण के साथ युद्ध में विजय प्राप्त हुई।

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