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विनायक चतुर्थी अथवा गणेश चतुर्थी की पोराणिक व्रत कथा

Vinayak Chaturthi Vrat Katha

vinayak chaturthi

विनायक चतुर्थी (Vinayak Chaturthi) हर महीने मनाई जाती है और गणेश चतुर्थी की तरह ही इसमें भी दस दिनों तक भगवान गणेश जी की पूजा की जाती हैं। पूरा देश गणेश उत्सव मनाता हैं परन्तु भारत वर्ष के महाराष्ट्र राज्य में गणेश जी का एक विशेष स्थान हैं। वहाँ पुरे रीती रिवाजों के साथ गणेश जी की स्थापना की जाती हैं और उनका पूजन किया जाता हैं।

विनायक चतुर्थी अथवा गणेश चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा

एक बार भगवान शिव तथा माता पार्वती के साथ नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। वहां माता पार्वती ने भगवान शिव से समय व्यतीत करने के लिए चौपड़ का खेल खेलना आरम्भ किया परंतु इस खेल में हार-जीत का फैसला कौन करेगा, यह प्रश्न उनके समक्ष उठा तो भगवान शिव ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका एक पुतला बनाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर दी और पुतले से कहा- ‘बेटा, हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, परंतु हमारी हार-जीत का निर्णय करने वाला कोई नहीं है इसीलिए तुम बताना कि हम दोनों में से कौन हारा और कौन जीता?’

उसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का चौपड़ खेल शुरू हो गया। यह खेल 3 बार खेला गया और संयोग से तीनों बार माता पार्वती ही जीत गईं। खेल समाप्त होने के बाद बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिए कहा गया, तो उस बालक ने महादेव को विजयी बताया। यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गईं और क्रोध में उन्होंने उस बालक को शरीर से विकलांग होने का श्राप दे दिया। बालक ने माता पार्वती से क्षमा मांगी और कहा कि यह मुझसे अज्ञानतावश ऐसा हुआ है, मैंने किसी द्वेष भाव में ऐसा नहीं किया।

बालक के द्वारा क्षमा मांगने पर माता पार्वती ने कहा की यहाँ पर गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएं आएंगी और जैसे वो गणेश व्रत की विधि बताए वैसे ही तुम गणेश व्रत करो, ऐसा करने से तुम्हे मेरे दिए गये श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।  यह कहकर माता पार्वती शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गईं।

एक वर्ष के बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आईं, तब नागकन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि जानने के बाद उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेशजी का व्रत किया। उसकी श्रद्धा से गणेशजी प्रसन्न हुए और उस बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिए कहा। उस बालक ने वरदान में अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर जाने वरदान माँगा।

यह व्रत विधि भगवान शंकर ने माता पार्वती को बताई। यह सुनकर माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जागृत हुई। तब माता पार्वती ने भी 21 दिन तक श्री गणेश का व्रत किया तथा दूर्वा, फूल और लड्डूओं से गणेशजी का पूजन-अर्चन किया। व्रत के 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं माता पार्वतीजी से मिलने आ गये।

उस दिन से विनायक चतुर्थी का यह व्रत समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला व्रत माना जाता है। इस व्रत को करने से मनुष्‍य के सारे कष्ट दूर होकर मनुष्य को समस्त सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं।

 

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