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वृश्चिक संक्रांति क्यों मनाई जाती है और जानें इसका महत्व

वृश्चिक संक्रांति (Vrischika Sankranti 2018)

   वृश्चिक संक्रांति                                       16 नवम्बर 2018
        दिन                                                      शुक्रवार
पूजा करने का शुभ समय:                     शाम 3:37 बजे से 5:23 बजे तक

vrishchik sankranti

संक्रांति को हिन्दू धर्म में बहुत ही पवित्र दिनों में से एक माना जाता है। जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में जाता है तो उसे संक्रांति काहा जाता हैं और जब सूर्य तुला राशि से वृश्चिक राशि में प्रवेश करते है तो उसे वृश्चिक संक्रांति कहा जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष में कुल 12 संक्रांति आती है और हर राशि में सूर्य 1 महीने तक रहते है। सूर्य के इसी भ्रमण की स्थिति को संक्रांति कहा जाता है।

यह संक्रांति गुरुवार पर पड़ने के कारण देव संक्रांति कहलाएगी। यह संक्रांति धार्मिक व्यक्तियों, वित्तीय कर्मचारियों, छात्रों व शिक्षकों के लिए बहुत शुभ मानी जाती है। वृश्चिक संक्रांति के विशिष्ट पूजन व उपाय से धन से जुडी समस्याओं का निदान होता है और छात्रों को परीक्षा में सफलता मिलती है और कैरियर में भी सफलता मिलती है।

संक्रांति के दिन धर्म कर्म और दान-पुण्य के काम करने का विशेष महत्व होता है। इसलिए बहुत से लोग इस दिन भी खाने पीने की वस्तुए और कपडे आदि गरीबों में दान करते है। वृश्चिक संक्रांति के दिन संक्रमण स्नान, विष्णु और दान का खास महत्व होता है। इस दिन श्राद्ध और पितृ तर्पण का भी खास महत्व होता है।

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मान्यताओं के अनुसार वृश्चिक संक्रांति में ब्राह्मण को गाय का दान करने का विशेष महत्व होता है। वृश्चिक संक्रांति के दिन की 16 घड़ियों को बहुत शुभ माना जाता है। इस दौरान दान और पुण्य करना बहुत लाभकारी माना जाता है।

संक्रांति के दिन शुभ मुहूर्त में स्नान, दान व पुण्य करना चाहिए। इसके पश्चात दान में गुड़, तेल, कंबल, फल, छाता आदि जो भी शर्धा हो उसका दान करने से लाभ मिलता है तथा पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

सूर्य की किरणें सेहत के लिए सुखदायी होती है और सूर्य की किरणों से हमारे शरीर को शक्ति भी मिलती है। 14 जनवरी ऐसा दिन है, जबकि धरती पर अच्छे दिन की शुरुआत होती है। ऐसा इसलिए कि सूर्य दक्षिण के बजाय अब उत्तर को गमन करने लग जाता है। जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर गमन करता है तब तक उसकी किरणों का असर खराब माना गया है, लेकिन जब वह पूर्व से उत्तर की ओर गमन करते लगता है तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायण के छह मास के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त हैं।

इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है।

वृश्चिक संक्रांति की विशेष पूजन विधि:

प्रातः काल जल्दी उठकर सूर्यदेव का विधिवत पूजन करना चाहिए। लाल तेल का दीपक जलाना चाहिए, गुग्गल की धूप करें, रोली, केसर, सिंदूर आदि चढ़ाना चाहिए। लाल व पीले फूल चढ़ाएं। गुड़ से बने हलवे का भोग लगाएं तथा रोली, हल्दी व सिंदूर मिश्रित जल से सूर्यदेव को अर्घ्य दें। लाल चंदन की माला से “ॐ दिनकराय नमः” मंत्र का जाप करें। पूजन के बाद भोग प्रसाद के रूप में बाँट दे और भगवान से मंगल कमाना करे। परीक्षा में सफलता पाने के लिए इस दिन सूर्यदेव पर खजूर फल के रूप में चढ़ाये और बाद में उन चढ़े हुए खजूर के प्रसाद को गरीब छात्रों में बाटें।

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